कानून

अंधश्रद्धा के विरोध में कानून का ईतीहास-

पिछले कई सालों से समाज में दुष्परिणाम फैलानेवाले अंधश्रद्धाओं का उन्मूलन करने हेतु कानून संमत करने के लिए एक मुहीम जारी है | महाराष्ट्र सरकार मे मीननीय मुख्यमंत्री श्री सुशीलकुमार शिंदे के नेतृत्व में ऐसा कानून केबिनेट की मीटिंग में पास किया है और उसे केंद्र सरकार की संमति के लिए आगे भेज दिया है| परिवर्तनवादियों की मेहनत तारीफे काबिल है. मगर अब भी काम पूरा नहीं हुआ है| इस प्रकार का कनून पूरे संसार में पहली बार संमत कराया जा रहा है। आदमी की तरक्की के साथ साथ जनसंख्या भी बढने लगी थी| छोटी छोटी टोलियाँ बनाकर रहनेवाले लोगों के बडे समूह बनने लगे। आपस में झगडे होने लगे। ऐसा न हो इसलिए कुछ कानून और कुछ नियम बनाने पडे। समूह की तरक्की अब जोरशोर से होने लगी और कानून तथा नियमों में सुधार हुए कानूनों का स्वीकार होने लगा।   समाज जैसे जैसे सुसंकृत और सभ्य होने लगा है वैसे वैसे मनुष्य की जिंदगी को नियंत्रित करनेवाले कानून में भी सुधार होता रहा है. यह सुधार अब भी जारी है. अपने यहाँ नैतिकता के विरोधी लोग भोली भाली जनता को गलत सलाह देकर लूटते रहते हैं. ऐसे लोगों की चंगुल से भोले लोगों की रक्षा करने हेतु कानून में बहुत ज्यादा सुधार करने की आवश्यकता है. अशिक्षित और सुशिक्षित दोनों प्रकार के लोग अब भी अंधश्रद्धा के शिकार होते रहते हैं। उनकी अंधश्रद्धाओं का फायदा उठाकर अपनी तिजोरियाँ भरनेवाले लोग बहुत होते हैं। समाज में सभ्यता बनी रहे इसलिए यह परिस्थिति बदलनी होगी. इस वास्ते सार्वजनिक शिक्षा का इंतजाम करना चाहिए और लोगों की अंधश्रद्धाओं और अज्ञान का लाभ उठानेवाले धूर्त लोगों की कृत्यों पर पाबंदी लगानी चाहिए. इसके वास्ते एक प्रभावी और स्पष्ट कानून की आवश्यकता है|

कानून की आवश्यकता

नये नये कानून बनाकर समाज बदलेगा क्या? ऐसा सवाल हमेशा पूछा जाता है. इसके लिए दहेजविरोधी और शराबविरोधी कानून का उदाहरण सामने रखा जाता है. पर कानीन से समाज बदलता नहीं है यह मानते हुए भी सती प्रथा और उसकी जैसी ही अन्य क्रूर प्रथाएँ इनपर कानून ने बंदी डालने पर ये प्रथाएँ बंद हुई यह ऐतिहासिक सत्य है| जनता, समाजसुधारक और समाजहितचिंतक सभी तहे दिल से यही चाहते हैं कि उन्हों ने जिन प्रतिनिधियों को चुनकर दिया है वे ऐसा कानून जलद जलद से पास कर दें।

प्रस्तावित कानून का स्वरूप

प्रस्तुत कानून के स्वरूप की एक खासियत यह है कि श्रद्धा और अंधश्रद्धा की परिभाषा करने के झमेले में यह नही पडता| इसके बजाय अंधश्रद्धा याने कौन कौन से कार्य होते हैं इनकी एक लिस्ट कानून की एक परिशिष्ट में दी गयी है| यह लिस्ट समय समय पर नयी बना सकते हैं. कानून संमत कराने में जो बडी बाधा थी वह इससे दूर हो चुकी है| यह लिस्ट बहुत ही लंबी है और इस में महाराष्ट्र भर में नज़र आनेवाली सभी  अंधश्रद्धाओं के बारे में लिखा गया है| लिस्ट में लिखी गई कुछ अंधश्रद्धाएँ –

  • भानामती और करनी करना
  • अलौकिक शक्ति का नाम देकर जादुई कर्मकाण्ड करना
  • भूतबाधा से छुडाने हेतु राख, तावीज, मंत्रित धागे आदि वस्तुएँ देना
  • अपने को अलौकिक शक्ति प्राप्त है ऐसा दावा करना और इसी प्रकार का विज्ञापन करते रहना
  • प्राचीन संतमहात्मा या देवी देवताओं के हम अवतार हैं यह दावे के साथ कहना और भोली भाली जनता को ठगना
  • देवी – देवता या भूत शरीर में प्रवेश करने का ढोमग करना और उनके नाम से चमत्कार करना
  • मानसिक रोगियों को भूत या किसी दुष्ट आत्मा सता रही है ऐसा कहकर उसकी मारपीट करना
  • अघोरी कर्मकाण्ड करते रहना
  • जादूटोना करके लोगों के भीतर घबराहट पैदा करना
  • लड़का होने के लिए गोपाल संतान विधि करना
  • विज्ञानानिष्ठ डॉक्टरी इलाज का विरोध करना और रुग्णों को अघोरी इलाज करने के लिए मजबूर करना
  • जादुई कंकर, संरक्षित तावीज अभिमंत्रित वस्तुओं की विक्री करना
  • शरीर में अलौकिक शक्ति का संचार होकर मानसिक अवस्था में सवालों के जवाब देने की कोशिश करना
  • भगवान को या आत्मा को या भूत को निष्पाप जानवरों की बलि चढाना
  • सांप या बिच्छू डसने के बाद उनका इलाज मंत्रतंत्रों से करना
  • बच्चा होगा इस बात की गेरंटी देकर जननशक्ति बढानेवाली दवाएँ देना

अंधश्रद्धा और महिलाएँ

अपने देश में महिलाएँ बहुत बडी संख्या में अंधश्रद्धाओं की शिकार बनती है। अंधश्रद्धा को फैलाने का काम भी वे ही ज्यादा मात्री में  करते रहती हैं। इस बात को मद्देनज़र रखकर समाज का कर्तव्य है कि वह ऐसी स्त्रियों को मानसिक गुलामी से छुँटकारा दिलायें। इस ध्येय की प्राप्कि के लिए महाराष्ट्र अंनिस ने अंधश्रद्धाओं को नष्ट करने का एक बढ़िया कार्यक्रम बनाया है|

कई कारणों से महिलाओं के मनपर ये अंधश्रद्धाएँ बहुत गहराई तक जम चुकी है। उन्हें कई मुसीबतों का सामना करना पडता है. स्त्रियों के हिस्से में पुरुषों की अपेक्षा पराजय, निराशा और मुसीबतें ज्यादा होती हैं इसी वजह से स्त्रियों का डर पुरुषों की तुलना में ज्यादा होता है। ऐसी स्थिति में वे ज्यादा अंधश्रद्ध बनें तो स्वाभाविक ही है|

अपनी पुरुषप्रधान समाजव्यवस्था यह उसका दूसरा कारण है. अच्छा पति मिलना और पुत्रप्राप्ति होना यही बात आज के जमाने में भी स्त्री जन्म की सार्थकता समझी जाती है। हजारों बरसों से सभी धर्मों ने स्थियों को हीन दर्जा देकर उसको ज्ञानप्राप्ति का और शिक्षा का अधिकार देने से मना किया है। यह धार्मिक संस्कार स्त्रियों के दिलों में इतनी गहराई से बस गया है कि वे यह सबकुछ एकदम सही और स्वाभाविक ऐसा ही समझ रही है।

नारियाँ अब भी सभी पुरानी रीति रिवाज़, रूढियाँ और कर्मकाण्डो को ज्यों की त्यों पलते जा रही हैं। शिक्षा और अर्थार्जन का अभाव, लैंगिक शोषण, कम वेतन, मालमत्ता में अधिकार न मिलना, विज्ञापनों में भोगवस्तू के रूप में इस्तेमाल  – इन सभी कारणों की वजह से महिलायेँ  अंधश्रद्धा की खाई में गिर रही है और अपने भोग को चुपचाप सहती रहती है।

उन्हें इससे बाहर निकालने के लिए अंनिस ने उनके भीतर चेतना जगाने का उपक्रम तैयार किया है। बहुत पहले इस संदर्भ में राज्य स्तर पर एक परिषद का आयोजन किया था। इस परिषद में सैंकड़ो सालों से जो अनिष्ट प्रथाएँ चली आ रही है उनका पर्दाफाश करने के लिए कुछ मार्गदर्शक सूचनाएँ दी गयी थी। उन सूचनाओं को ध्यान में रखकर अंनिस की महिला कार्यकर्ता समय समय पर मीटिंगे बुलाकर गहराई के साथ चर्चा करती है।