मिश्र विवाह

सादगी से विवाह संपन्न

ठाठबाट से शादी करके उसमें जो फालतू खर्च किया जाता है , उसे बचाने के लिए अंनिस सत्यशोधक विवाह विधि का प्रचार प्रसार करती हैI शादी ब्याह में जो कर्चा करना पडता है उससे कई परिवार कर्जो में डूब जाते हैI

महाराष्ट्र के 20 वी सदी के समाज सुधारक ज्योतिराव फुलेजी ने कम से कम खर्च में विवाह पद्धति का प्रारंभ कियाI इस विधि में पुरोहित की आवश्यकता नही होतीI इन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना कीI ऐसी शादियाँ सत्यशोधक समाज की ओर से की जाने की वजह से इस नयी शादी का रीति को सत्यशोधकी शादी कहते हैंI शादी ब्याह में फिजूल खर्ची को टालकर इसी तरीके से शादी करने के लिए अंनिस के द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है I

महात्मा ज्योतिराव फुले

ज्योतिरावजी  फुले दूरदृष्टि रखनेवाले समाजसुधारक थेI भारत के आधुनिक इतिहास में उनके द्वारा किये गये कार्य की कोई बराबरी नहीं कर सकताI पहली बार हमारे देश में सन 1850 में उन्हों ने दलित बच्चो के लिए पाठशाला शुरु करके शिक्षाक्षेत्र में क्रांति कीI हजारों सालों से शिक्षा से वंचित बच्चों की शिक्षा का अधिकार उन्हों ने प्राप्त करायाI खुद की पत्नी सावित्रीबाई को भी उन्हों ने पढना लिखना सिखाया और लोगों के सामने आदर्श प्रस्थापित कियाI ऐसी सुशिक्षित पत्नी के सहयोग से पुणे शहर में लड़कियों के लिए एक स्कूल शुरु कीI यहाँपर वे अन्य स्त्रियों को भी पढ़ाने लगीI

उनका एक और महत्वपूर्ण कार्य थाI जनसामान्य के जितने भी पर्व और उत्सव थे उसमे नयी जान फूंकने का काम उन्हों ने कियाI सीधी –सादी मराठी भाषा में उन्हों ने सत्यधर्म नामक किताब लिखीI इस किताब में जन्म से लेकर मृत्यु तक ज़िंदगी में जो धर्मसंस्कार कराये जाते हैं उनकी जानकारी प्रस्तुत कीI यह सब करते समय उन्हों ने हर आदमी की प्रतिष्ठा, मान-सन्मान औक पवित्रता रखने को ज्यादा महत्व दियाI धर्म के नामपर समाज में उंच – नाच का भेदभाव करनेवाले अंधश्रद्धा फैलानेवाले और भगवान को ही बेचनेवाले लालची लोगों से उन्हें बहुत नफरत थीI  वैदिक परंपरा के अनुसार होनेवाली शादियों में पुरोहित लोग संस्कृत भाषा में स्तोत्र बोलते हैंI दूल्हा दूल्हन उनका पुनरुच्चार करते हैंI इस अपरिचित संस्कृत भाषा के मंत्रों के स्थान पर उन्हों ने सबकी समझ़ में आये ऐसी भाषा में मंत्रों की रचना की और समय के अनुसार नई विवाह पद्धति शुरु कीI

विवाह का विवरण

महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, इन् तीनो प्रांतो में समाज की विवाह पद्धति  में साथानिक प्रथाओं को ही नीव माना गया है और नयी पद्धति का प्रारंभ हुआ हैI इसका पूरा विवरण इस प्रकार है –

स्वागत – मंच पर वधूपक्ष के पांच औक वरपक्ष के पांच प्रतिनिधियों को बुलाकर उनका परिचय कराया जाता है और उनको सन्मानित किया जाता हैI ये लोग वधूवर के माता-पिता, दादा दादी चाचा बुआ ऐसे रिश्तेदार होते हैंI वे लोग एक दूसरे को पुष्पहार शाल आदि देते हैंI पुरोहित का भी परिचय करा के उनको सम्मानित किया जाता हैI

अग्निप्रदीपनम् – पुरोहित वधूवर के मामा अथवा मित्र को वधूवर के मंच पर ले आने का अनुरोध करता हैI वे दोनों मंच पर आने के बाद सब के सामने उनका परिचय होता हैI तत्पश्चात अग्निकुंड में अग्नि प्रज्वलित किया जाता हैI वर वधू  के हाथों में चंदन की लकडी के छोटे छोटे तुकडे देकर उन्हे निम्न बातों का उच्चारण करने के लिए कहा जाता हैI

हम हमारे मन में स्थित सभी नकारात्मक  और दुष्ट विचारों को बाहर निकाल कर निर्मल मन से विवाहविधि संपन्न करेंगेI उसके प्रतीक के रूप में यह चंदन हम अग्नी में समर्पित करते हैंI हमारे सभी बुरे विचार अग्नि में भस्म कर रहे हैंI इससे ज्यों चंदन की सुगंधि सारे वातावरण में फैलकर वातावरण गंधित होता है वैसे ही हमाारे मन भी शुद्ध होंगेI   वधूवर अग्नि के सामने हाथ जोडकर खडे होते हैं और उपस्थितों की सदिच्छाएँ अग्नि, वरुण, पृथ्वी, वायू, आकाश, जल और पूर्वजों कि स्मृति इन प्राक-तिक शक्तियों का आशिर्वाद मिलने हेतु स्तोत्र बोलते हैंI

सप्तपदी

समारोह के पुरोहित वधू वर को हाथ में हाथ मिलाकर अग्नि को सात फेरे लगाने को कहते हैंI ये सात महत्वपूर्ण फेरे उन्हें अगली जिंदगी में सुखी, फलदायी, यशस्वी, वैभवशाली और समाजोपयोगी जीवन जीने के लिए मदद करेंगेI पुरोहित हर फेरे के समय उन्हें एक मंत्र बोलने के लिए कहता हैI

  1. जिंदगीभर हमें दूसरे की निष्टा और प्यार प्राप्त होI
  2. निर्माता ने निर्माण की हुई हर चीज के प्रति आदर और आस्था रकने की शिक्षा मिलेI
  3. अन्य लोग हमें आदर दें ऐसा लगता है वैसे ही हम भी एक दूजे को और अन्य सभी को आदर और सम्मान देंI
  4. हमारी ओर से मनिष्टों के प्रति वंश, धर्म, जाति या लिंग को लेकर किसी प्रकार का भेदभाव न होI
  5. मन में श्रमप्रतिष्ठा बनी रहे और स्वयं मेहनत कर के हमारी जिंदगी के सपनों को हम पूर्ण करे और मानव जाति को इसका उपयोग होI
  6. हमारे विचार विवेकपूर्ण हो और अपनी सेहत का ध्यान हम रखें ताकि हमारे निरोगी शरीर में निरोगी मन रहेगाI
  7. हम निरोगी, संपन्न और सयाने बनें जिससे हम जिन्हें जन्म देंगे उस नयी पिढी का अच्छा लालनपालन करके उन्हें सक्षम बनाएँI

मंगल गीत

पुरोहित वधू वर को मंचपर रखी हुई कुर्सीयों पर बैठने के लिए  कहता हैI उनके हाथों में पुष्पहार – पुष्पगुच्छ देता हैI उसके बाद वधू कहती है-

प्रियतम, आप मुझे प्रेम दीजिए और जीवनसंगिनी बनाकर हम दोनों निरंतर एक दूसरे के विकास के लिए प्रयत्नरत रहेंI नारी की प्रतिष्ठा को कभी भी हीन मत होने देनाI

पत्नी अपने पति की प्रेरक शक्ति होती है यह बात ध्यान में रखनाI

वर कहता है –

अन्य सभी स्त्रियो को मैं बहन मानता हूँI केवल तुम ही मेरी प्रिया होI

यहाँ उपस्थित सब लोगों के सामने मैं तुम्हारा स्वीकार करता हूँ अपने परिवार के रथ के हम दो चक्र हैI

इन चक्रों को गतिशील रखकर हम जीवनकार्य को संपन्न करेंगेI

वधू वर एक साथ  कहते हैं –

हम दोनें मिलकर प्रगतिपथ पर अग्रसर होते रहेंगेI हम अंधश्रद्धाओं से दूर रहकर सत्य को अपनायेंगेI

हमारा परिवार, समाज और हमारा देश इनका हमेशा हम सम्मान करेंगेI (पृ. 75) हम से जब भी गलतियाँ होंगी हम उन्हे तुरंत सुधारेंगेI

वधू – वर को शुभाशीष देने आये हुए निमंत्रित कहते हैं –

आज आप दोनों अपने वैवाहिक जावन का शुभारंभ कर रहे हो- सुखी बनोI

जिंदगी में तुम्हें सुयश प्राप्त होI

आप दोनों मधुर बोलें और उम्रभर सत्कार्य करते रहेंI

आप हमेशा कार्यरत रहकर अपना और समाज का नाम रोशन करेंI

आपको सुखी और सफल जिंदगी प्राप्त हो|

जीवनभर अच्छे कर्म करते रहो|

आज के इस हर्षभरे मौके पर यही हमारी शुभकामनाएँ|

आप दोनों को जिंदगीभर खुशी और समृद्धी प्राप्त होI

आप के सुखी और संपन्न जीवन के लिए हमारा आशिर्वाद हैI

वर कहता है –

आज से मैं तुम्हे पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ मैं कसम खाता हूँ कि मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगाI तुमपर संशय नहीं करूंगा, तुम्हे किसी की तकलीफ नहीं होने दूंगाI

सदैव तुम्हारा सम्मान करूंगा और तुम्हे सुख में रखूंगाI वधू कहती है – आज से मैं तुम्हे अपना पती मानती हूँ मै शपथ लेती हूँ कि  मेरे मन में   मै कभी भी संदेह नहीँ रखूंगीI हमेशा तुम्हारे सुख दुख में हिस्सेदार बनूंगी, तुम्हे किसी प्रकार की तकलीफ़ नहीं होने दूँगीI तुम्हारा सदैव आदर करूंगी और हमेशा तुम्हारे सुख का ध्यान रखूंगी।

वधू वर एक दूसरे को वरमाला पहनाते हैं और पुष्पगुच्छ एक दूसरे को प्रदान करते हैंI वर वधू के गले में मंगलसूत्र डालता है और वधू वर के गलें में डालने के लिए चेन देती हैI पुरोहित विवाह संपन्न हो जाने की घोषणा करता हैI वधू वर उपस्थितों को धन्यवाद देते हैंI

यह पूरा समारोह लगभग आधे घंटे में संपन्न हो जाता है|