गणेश विसर्जन

महाराष्ट्र के  गणेशोत्सव का इतिहास पुराना हैI मगर लोकमान्य तिलकजी के सामने जो ऐतिहासिक उद्देश्य था वह अब नष्ट होने लगा हैI अब यह पर्व पहले जैसा सामाजिक और कला कौशल्य का खात्मा करनेवाला एक शो बिझनेस बनकर रह गया हैI दस दिन तक महोत्सव के नाम से चलनेवाला यह तमाशा स्थनिक लोगों के लिए सरदर्द बन गया हैI सोगों से जबरदस्ती चंदा लिया जाता हैI दस दिन तक जोर जोर से बजनेवाले सिनेसंगीत को सुनना पडता हैI गणेश भक्तों के बीच आपस में होनेवाले झगडों को देखना, सुनना पड़ता हैI सबसे खतरनाक बात तो यह है कि दसवें दिन गणेश मूर्तीयों का विसर्जन होता है जससे पीने का पानी बड़े पैमाने पर प्रदूषित हो जाता हैI

वास्तव में यह एक धार्मिक और पारिवारिक उत्सव होने के साथ-साथ सामाजिक उत्सव भी हैI सामाजिक उत्सवों में कई शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैI रास्ते भर में बड़े बड़े मंडप डाले जाते है जिससे कई बाधाएँ पैदा होती हैI स्थानिक कलाकार इन मंडपों का डेकोरेशन करते हैंI 5-6 फीट से भी ज्यादा लंबी मूर्तियों की होती हैI सार्वजनिक शोर शराबे के साथ-साथ  घर – घऱ में गणेशस्थापना और साजश्रृंगार होते ही रहता हैI ये मूर्तियाँ मिट्टी की या प्लॅस्टर ऑफ पॅरिस की बनी होती हैI उसपर पोता गया रंग जहरी होता हैI ऐसी हजारों मूर्तियाँ जब पानी में विसर्जित की जाती है तब पानी प्रदूषित होगाहीI किसी नगरपालिका ने एक करोड़ रु कर्च करके विसर्जन हेतु बांधकाम करने की योजना बनाईI उसमें सारी मूर्तियोँ का विसर्ज हो सकता था पर सौभाग्य से विवेक जाग्रत हुआ और यह योजना बंद पड़ गई।

गणेशोत्सव के दरम्यान 10 दिन तक मूर्तियोँ को बड़े बड़े पुष्पहार पहनाते हैंIभक्तगण दिनभर दर्शन के लिए आते ही रहते हैं और भगवान के चरणों में पुष्प, मालाएँ चढ़ाते रहते हैंI दसवें दिन यह सब विसर्जित किया जाता है जिससे पानी का प्रदूषण और ज्यादा बढ़ जाता हैI

पिछले साल अंनिस ने पुणे, सातारा, सोलापूर, कोल्हापूर, इस्लामपूर आदि चुने हुए शहरों में लोगों से कहा कि ये कचरा और मूर्तियाँ पानी में विसर्जित न करने का आवाहन कियाI पत्थरो के निरुपयोगी बने खदान में पानी जमा हो जाता हैI वह पानी पीने के लिए या अन्य किसी बात के लिए उपयोगी नहीं होताI अंनिस ने नगरपालिकाओं की मदद से दान में प्राप्त सभी मूर्तियाँ और फूलों का कचरा इस पानी तक ले जाने की व्यवस्था कीI तब कुछ हिंदू मूलतत्ववादियों ने उनकी पुराने विचारोंवाली संघटनाओं की सहयता से इस कार्यक्रम को परमपवित्र हिंदू परंपराओं का अपमान करनेवाला कार्यक्रम कहकर विरोध कियाI मगर इस नया और उचित ऐसे कार्यक्रम को संमति होने से लोगों ने समारोह के मंच से लोगों को हटा दियाI समाज के सभी घरों में इस नई प्रथा का स्वागत हुआI अचरज की बात तो कर्मठ लोगों का अड्डा जहाँ है ऐसे पुणे शहर में नागरिकों ने भी अगवानी कीI अंनिस के सामान्य कार्यकर्तागण धर्म और रूढ़ीयों से चिपके नही रहतेI श्रद्धालू तो वे होते ही नहींI फिर भी वे कभी लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड नही करतेI गणेश भक्तों को उन्हों ने कहा था कि मूर्तियोँ को तोडने नही देंगेI इसी काम की ओर सबका ध्यान लगा रहा था इसलिए अंनिस जो कार्यकर रहा था उधर लोगों का ध्यान गया और अंनिस के कार्य का महत्व लोगों ने जानाI अकेले पुणे में अमनिस ने 1000 मूर्तियाँ और महाराष्ट्र से 15000 मूर्तियाँ दानमे प्राप्त कीI इन सभी मूर्तियोँ का विसर्जन निरुपयोगी खादानों में जमें हुए पानी में कियाI

मूर्तिदान के इस कार्यक्रम के साथ निर्माल्यदान का भी कार्यक्रम शुरु हुआI पिछले सात सालों से यह कार्यक्रम कोल्हापूर में सफलता के साठ चालू हैI 10-15 ट्रक भर के यह निर्माल्य (फूलों का कचरा) अंनिस ने खेती विभाग को खाद बनाने के लिए दिया जाता हैI इस साल संपूर्ण महाराष्ट्र में यह कार्यक्रम शुरु करने का अंनिस का इरादा हैI

अंनिस के जैसे कई संस्थाएँ पर्यावरण रक्षा के कार्य में जुडी हुई हैI  ऐसी संस्थाएँ यदि इकठ्ठी आकर रक्तदान और नेत्रदान की मुहिमों के समान इसे भी व्यापक बना दें तो बड़ा काम हो सकता हैI

अलावा इसके अंनिस ऐसे पर्व और उत्सवों के समय जो दुराचार होते हैं उन्हें भी रोकने की कोशिश करती हैI ऐसे उत्सवों में लोगों का भीड़ बहुत बढ़ जाती है अतः पोस्टर प्रदर्शन का उपयोग अच्छा होता  हैI स्थानिक कलाकारों को मंडप डेकोरेशन करके अपनी काला का प्रदर्शन लोगों के सामने करने का अच्छा मौका मिलता हैI कई जगह सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को उजागर किया जाता हैI लोग बडी संख्या में आते हैं अतः इस बातका फायदा उठाकर व्यसनमुक्ति, भोगवाद का विरोध, स्वच्छता अभियान पर्यावरण रक्षा ऐसे कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम में लोगों को सहभागी किया जा सकता हैI कलाकारों के जरिये अंनिस ने पोस्टर्स की 1000 प्रतियाँ छापकर अलग अलग जगहों पर चिपका दिएI इन गंभीर समस्याओं के प्रति लोगों को सचेत करने के लिए ऐसे उत्सवों का उपयोग करना चाहिएI

स्थानिक परिस्थिति के अनुसार  पर्व – त्योहार मनाने चाहिए ऐसा अंनिस का आग्रह होता हैI विसर्जन हेतु मूर्तिदान करने के लिए स्थानिक परिस्थिति यदि अनुकूल ना हो तो विसर्जन टब के पानी में भी किया जा सकता  है और विसर्जन के पश्चात टब में से मिट्टी जम जाती है उसे घर के समीप ही खुली जगह में गड्ढा बनाकर डाल देंI इससे बड़े पैमाने पर जलप्रदूषण को टाला जा सकता हैI उत्सवों का उपयोग अच्छे कार्यो के लिए हम कैसे कर सकते हैं इस बारे में सोचनेवाली संस्थाओं को अंनिस के साथ संपर्क बनाना चाहिएI नवयुग, नवसमाज और उनकी मानसिकता के साथ मेल खायें ऐसेही ुत्सव मनाने की नई पॅरॅडिम शुरु होना चाहिए.