वैज्ञानिक दृष्टिकोन

वैज्ञानिक मनोवृत्ती

विज्ञान ही ऐसा एकमात्र अस्त्र है कि जो अपने यहां के भूख, दरीद्रता, अस्वछता, और निरक्षरता, अंधश्रध्दा और प्राचीन रुढी-पंरपराऐं नष्ट होनेवाली साधनसंपत्ती और इस समृध्द देश की भूखमरी ऐसी कई समस्याओं का समाधान ढूँढ  सकता है! आज इस संसार में विज्ञान से आंखे फेरना किसे संभव होगा? हर बात में हमें विज्ञान की मदद लेनी पड़ती है| निकट भविष्य में विज्ञान और विज्ञान के मित्रौं को ही जीने का अधिकार है|

 जवाहरलाल नेहरु

हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरुजी की इस घोषणा को साठ से भी ज्यादा साल बीत चुके है फिर भी ७ लाख देहातों के इस समृध्द देश में हरितक्रांती के कारण भुकमरी नही है फिर भी लोग अंधश्रध्दा और जानलेवा परंपराओं की जंजीरों में बंधे हुए है! ये जंजीरे तोडे बिना विज्ञान के साथ दोस्ती करने का नेहरुजी का सपना साकार नही हो सकता| ऐसी स्थिति में विज्ञान या तो कुछ लोगों के हाथ का खिलौना बनकर रहेगा या फिर शोषण को एक साधन बनकर रहेगा|

समाज में वैज्ञानिकता को बढ़ावा देने के लिए विज्ञान और तंत्रज्ञान के प्रचार-प्रसार की अपेक्षा और भी बहुत कुछ करना होगा.सायंटिफिक टेंपर यानी केवल ज्ञान वृध्दी के लिए आवश्यक जानकारी प्राप्त करना और कुछ तथ्यों को जानना मात्र नहीं है.विवेक को वृध्दींगत करनेवाला विवेकवाद नहीं होता.उसमें और भी बहुत कुछ होत है| वैज्ञानिक चित्तवृत्ति (सायंटिफिक टेंपर) यह तो मन का एक खेल है| जिसके कारण व्यक्ति का एक खाल दृष्टिकोण और बर्ताव की निश्चीत होती है! ऐसी बात किसी धर्म या देश तक सीमित नहीं होती! वह तो पूरे विश्व के लिए है|यह बात एक प्रभावी नैतिक मूल्य के रुप में समाज के सभी स्तरों में फैल जानी चाहिए क्योंकि हम क्या सोचते है और हमारी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक समस्यांओं का समाधान कैसे ढूँढते है– इन सभी बातों पर वैज्ञानिक चितवृत्तियों का गहरा प्रभाव पड़ता है| वैज्ञानिक चितवृत्ति में मंजूर की गई बातें कुछ इस तरह है —

  • वैज्ञानिक पद्धति ज्ञानप्राप्ति की एक विश्वसनिय पध्दति है|
  • इस पध्दति के अनुसार प्राप्त ज्ञान का उपयोग करके कई मानवी समस्याओं को समझा जाता है और उनका हल निकाला जाता है|
  • वैज्ञानिकता आदमी की रोजमरी की जिंदगी में और नैतिकता से राजनिती और अर्थकारण जैसे क्षेत्र में मनुष्य के प्रयत्नों में पूरी तरह से प्रयोग में लानी चाहिए तभी आदमी टिक सकेगा, इस भू पर जी पाएगा|
  • वैज्ञानिक पध्दति के द्वारा हासिल किया हुआ ज्ञान उस समय ज्ञात सत्य के नजदिक जा सकता है – यह बात सबको माननी चाहिए! इस ज्ञान को गलतसाबित करनेवाले के प्रति शंका प्रकट तकनी चाहिए और तत्कालीन ज्ञान का बार-बार परिक्षण करते रहना चाहिए| वैज्ञानिक पध्दति याने जानकारी इकठ्ठी करके उसकी जाँच पडताल करना। फिर उसमें से मानवी स्वभाव, मनुष्य का प्राकृतिक और सामाजिक वातावरण इनका अध्ययन करके एक ढाँचा तैयार करना! इस तरह यह एक रीजनरेटिव्ह प्रक्रिया होती है| इस परह मनुष्य के ज्ञान के सभी पहलू वैज्ञानिक पध्दति के अंतर्गत आते है और भौतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, उपयोजित विज्ञान के अलग-अलग कंपार्टमेंट ज्ञानार्जन करने में बाधक नहीं हो सकते।ये सारी बातें ध्यान में रखकर अंनिस वैज्ञानिकता का देहातों में प्रचार करने  के लिए कई कार्यक्रम करती है। समाज के हर तबके में वैज्ञानिक प्रवृत्ति को  प्रस्थापित करना यही अंनिस का सपना है|

वैज्ञानिक प्रकल्प

विज्ञान और तंत्रज्ञान का प्रभाव रोजमर्रा के जिंदगी में हर कोई महसूस करता है किंतु वैज्ञानिक दृष्टी से साक्षर आदमी और आम आदमी की वैज्ञानिक प्रवृत्ती में बहुत बडा फर्क होता है।  सुशीक्षित लोगों में भी कितने लोग ऐसे होते की जिनमें ही अर्थ में वैज्ञानिकता कूट कूट कर भरी नजर आती है ? हमारे संविधान ने भलेही हर भारतीय नागरिक का कर्तव्य वैज्ञानिक बननेका माना है फिर भी उसका पालन धीमी गति से हो रहा है।  कभी कभी तो उलटी दिशा में लोग जाते हुए दिखाई पडते है।  अंधश्रध्दा को हटानेवाली वैज्ञानिक प्रवृत्ति को समाज में प्रस्थापित करने की योजना में अंनिस को पाटशालाओं में पढनेवाले बच्चों को अपना लक्ष्य बनाना ज्यादा उचित लगता है।  बचपन में ही बच्चों के दिमाग में यह प्रवृत्ती स्थापित कर दें तो इसका फायदा उन्हें जिंदगीभर मिलता रहेगा।  किंतु आजकी प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा में इस प्रकार की कोई तजवीज दिखाई नहीं देती।  यह त्रुटी दूर करने हेतु अंनिस ने अनौपचारिक शिक्षा के जरिए बच्चों को अंधश्रध्दाओं के कारण होनेवाला नुकसान और उसके जरिए होनेवाला शोषण, चमत्कारों के पीछे छिपा हुआ सच सिखाने की योजना बनाई है।

केवल मात्र भाषण और प्रयोंगो के द्वारा अपना उद्देश सफल नही होगा तो ज्ञानप्राप्ति को लिए व्याख्यानों के साथ साथ स्वंयअध्ययन, मित्रों और अध्यापकों को साथ चर्चाएँ होना चाहीए ऐसा अंनिसा कों लगने लगा क्योंकी इनके माध्यम से बच्चे के पल्ले क्या पडा यह समझ में आयेगा।  यह योजना सफल बनाने को प्रमुख भुमिका अध्यापकों की होगी।  अत: अलग-अलग उम्र के छात्रों के लिए विविध विषयों की पढाई के साथ-साथ अध्यापकों को प्रशिक्षित करने की योजना भी बनाई गई।  स्कूल के समय के बाद और छुटी के दिन वैज्ञानिकता को बढावा देने के लिए अध्यापकों को प्रशिक्षित करने की बाते इस योजना में है।  छात्रों की ज्यादा ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता को जान लेना और उनकी बीच-बीच में परीक्षा लेने का काम भी अध्यापकों को सौंपा गया है।  अभ्यासक्रम का तीन स्तरों में बटवारा किया गया है –

१) वैज्ञानिकता का परिचय –

चौथी से सातवी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए।  इसमे छात्रों को अंधश्रध्दा का मूल और वैज्ञानिक प्रवृत्तियों का परिचय कराया जाता है।

२) वैज्ञानिक एहसासों की खोज –

आठवी, नौवी और दसवी के विद्यार्थियों के लिए।  इस काल में अभ्यासक्रम में   स्थित अलग-अलग विषयों का अध्ययन विस्तार के साथ कराया जाएगा।

३) सत्यशोध प्रबोध –

महाविद्यालयीन छात्रों के लिए।  इसके अंतर्गत विवेकवाद, इहवाद जैसे तात्विक विषय और मानसिक बिमारी इस विषय का अध्ययन होगा।हर ३० मिनट की एक कालावधि इस प्रकार की कुल दस कालावधियों में कार्यक्रम पूरा होगा।  इन ३० मिनटों में से लगभग २० मिनट तक विषय का स्पष्टीकरण होगा अध्यापक विषय की जानकारी देंगे और बचे हुए मिनटों में चर्चा एवं सवाल जवाब होंगे।

अध्ययनार्थ विषय –

1) वैज्ञानिक प्रवृत्ति

2) श्रध्दा और अंधश्रध्दा

3) मानसिक बीमारियाँ और उसपर किये जानेवाले उपचार

4) खगोलशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र

5) सर्पविज्ञान का अध्ययन और सर्पदंशपर उपलब्ध उपाय

6) चमत्कार, भानामती और समोंहन का वैज्ञानिक दृष्टिसे स्पष्टीकरण

7) दैवी शक्ति का दावा करनेवाले बाबा लोग और माताजी का पर्दाफाश

8) भानामती

9) समाजसुधारकों का कार्य

10) विवेकवाद

11) व्यसनमुक्ती

इन सब विषयों को बीच अन्यथा कई मुद्दे होते हैं।  जैसे वैज्ञानिक प्रवृत्ति को ही लीजिए।  इसकी अलग-अलग विशेषताएँ (पृ। ४), सबूत, स्वतंत्रता, निर्भयता और नम्रता को बढावा देनेवाली वैज्ञानिक विचारप्रक्रिया, महात्माओं के कारनामे, समाज में प्रचलित परंपराएँ और कर्मकान्ड इनका उगम और अर्थ; नैतिक मूल्य पर और वैज्ञानिक प्रवृत्ति आदि।

अध्यापकों को प्रशिक्षित करनेवाले शिबिर जिला स्तर पर और प्रमूख शहरों के शिक्षा विभाग के प्रमुख अधिकारियों की लीखित इजाजत से ऐसे शिबिर आयोजित किए जाते है|अध्यापक गण इस मौके का फायदा उठा सकते है| शिबिरो में उनकी उपस्थिती उनके काम का दिन माना जाता है| अंनिस के कार्यकर्ता लोग और उस क्षेत्र के तज्ञ लोग सभी बातें तय करते है|  (अभ्यासक्रम, उसको पुर्ण करना, उसके लिए लगनेवाला सामान आदि) अध्यापक लोग अपने व्याख्यान के बाद चर्चा में हिस्सा लेकर अपनी सारी शंकाओं का समाधान प्राप्त करते है|  अंनिस ने हमेशा पूछे जानेवाले सवालों की एक लिस्ट बनायी है| यह लिस्ट छात्रों के लिए भी उपयुक्त है|  अध्यापकों को ऐसे  शिबिरों का लाभ तो होताही है|  अलावा इसके अंनिस को कुछ नए कार्यकर्ता भी मिल जाते है|  अब तक पचास हजार अध्यापक और 5 लाख छात्रों ने अंनिस के ऐसे शिबिरों का लाभ उठाया है|

मनोवृत्ति में परिवर्तन

शिबिरों में हिस्सा लेनेवाले लोगों की मनोवृत्ती में गौर करने लायक परिवर्तन दिरवाई देता है| आपके घर के लोगों की तीन अंधश्रध्दाओं को आप नोट किजिए। इससे प्रशिक्षण लेनेवाले के मन में जिज्ञासा जाग्रत होती  है| इस मामले में छात्र कभी भी उदास नही रहते।   एक बार उनकी जिज्ञासा जाग्रत हुई कि वे निर्भयता के साथ अंधश्रध्दाओं के बारे में अपना नापसंदगी माता-पिता के सामने व्यक्त करते है| अभिभावकों को भी फिर खुद में थोडा बहुत परिवर्तन करना पडता है| बच्चा नही तो अभिबावक हि प्रमुख समस्या है ऐसी बात कई शिक्षाविद कहते है|  यह सत्य है!  में शिक्षा पाकर अपने अभिबावकों के अविवेकी और अवैज्ञानिक बर्ताव का विरोध करनेवाले छात्रों के कई उदाहरण मिलते है|   21 सिंतबर 1995 के दिन अलग-अलग जगहों की गणेशजी की मुर्तीयाँ अचानक दुध पीने लगी! इस बात का विरोध सभसे पहले छात्रों  ने  किया। ऐसा ही विरोध छात्रों  ने ग्रहण के वक्त भी किया। शिबिरों नें हि्स्सा लेने वाली लडकियाँ बी स्त्री-पुरुष भेद करनेवाली प्रथाओं और कर्मकाण्डों का विरोध करती  है|  छात्रों   के लिए शिबिरों  का आयोजन करनेवाले अध्यापकों की मनोवृत्ती में भी काफी फर्क महसुस होता है| पिढीतों से चले आ रहे उपवास, फलद्योतिषी पर किया जानेवाला विश्वास, पुराने जमाने से चले आ रहे खर्चीले एवं निर्रथक तीज त्योहारों को लगभग सभी अध्यापकों ने अवनी जिंदगी से हटा दिया है|

संक्षेप मे जो फर्क नज़र आये वो इस प्रकार है!

1) बाबा, बुवा और माता इन सबकी अपने मन पर जो पहले पकड थी वह अब कम हो गयी है|

2) सुधार करने में बच्चों को रस आने लगा है|

3) भूतबाधा, जादू, मुठी मारना जैसी  अंधश्रध्दाओं बर आधारित बातों की पोल खोलने में विघार्थी गण हिस्सा लेने लगे है|

4) लड़कियाँ भी निर्भयता के साथ लिंगभेदबढानेवाले कर्मकांडों को आवाहन करने लगी है| कट्टर श्रध्दाळू और अंधश्रध्दालुओं के साथ वाद करते समय प्रशिक्षित लोग शिबिरों के अभ्यासक्रम का सामान संदर्भ और मार्ग दर्शन हेतु इस्तेमाल करने लगे  है|

5) प्रशिक्षित विघार्थी अन्य छात्रों को इस शिबिर का लाभ उठाने के लिए प्रवृत्त करने लगे है|

6) अपने परिकर में घट रही घटनाओं के प्रति विघार्थी जाग्रत होकर उसमें रस लेते हुए दिखाई दे रहे है|

7) स्वंय का ज्ञान बढाने के लिए विघार्थी निरंतर जादा जानकारी देनेवाले साहित्य की मांग कर रहे है |

8) एक लड़के को यूं शिक्षित कर देने से उसका पूरा परिवार ही नहीं, उसके पडोसी भी शिक्षित हो रहे है|

विज्ञान और तंत्रज्ञान ठेठ आपकी दहलीज पर अब तक कई जगह असफल  (प्रकल्पो में ) विघार्थीयों को शहरो के खास इलाकों में बुलाया जाता  है|  अंनिस ने ये सभी प्रकल्प विघार्थीयों के दरवाजे तक ले जाने का निश्चय किया है| ऐसे प्रकल्प केवलमात्र मराठी भाषा जानने वाले महाराष्ट्र तक ही सीमित न रखते हुए पूरे देश में इनका अनुकरण होना चाहीए। इसके लिए जितनी संभव हो उतनी मदद देने के लिए अंनिस तैयार है|   देशके लाखों विघार्थीयों में वैज्ञानिक मनोवृत्ती पनपाने में इस तरह के प्रकल्पों की वजह से गति मिलेगी।