पुनर्जन्म

पुनर्जन्म याने मरने के बाद आदमी के शरीर का विघटन होता है।  मगर उसमें का कोई अंश फिर से नये शरीर के रुप में जन्म लेता है।    हमें इससे पहले भी जन्मे थे और बाद भी जन्म लेगें – यह कल्पना याने पुनर्जन्म।    पहलेवाले या इसके बादवाले जनम में कुत्ता अथवा अगले जनम में छोटा-सा किडा भी होना संभव है।    कुछ जातियों में विशिष्ट जानवरों का मांस नहीं खाया जाता क्योंकि वे समझते हैं कि उनके पूर्वज वही जानवर हैं।    कोई आदमी अपनी कन्या जन्म लेने से पूर्व मर जाता है तब उसकी आत्मा उसकी कन्या की जनम होते ही उसमें प्रवेश करती है ओर खुद की लड़की के रुप में वह दुबारा जनम ले सकता है।

पुर्वजन्म ओर पुनर्जन्म ये श्रध्दाएँ बौध्द और हिंदू लोगों में पायी जाती है।    इन धर्मों में  पुनर्जन्म यह बात पुण्य की नहीं समझ जाती  है।    मोक्ष मिलना याने जन्म-मृत्यु के फेरे से छुटकारा मिलना यह बात पुण्य प्रद समझी जाती है।    पुनर्जन्म को माननेवाले प्राचीन धर्मों में आत्मा यदि दूसरा शरीर धारण करें तो उसें आध्यात्मिक पतन माना जाता है।  अगला जनम तुम्हें किसका जाहिए इसा आधार पर तुम्हारी इस जनम  का बर्ताव अच्छा होना जरुरी है।

इससे संबधित कुछ समस्याएँ –

पुनर्जन्म की कल्पना के अनुसार मृत व्यक्ति को भीतर की कुछ बातों का अंश दुसरे नए शरीर में प्रवेश करता है।  इस नए शरीर में वे बातें हमेशा के लिए टिकी रहती है।  पुनर्जन्म की संकल्पना से कुछ तात्विक बातें सामने आती है।  पुनर्जन्म में फिर से क्या जन्मता है ?   फिर से जन्म लेनेवाली आत्मा होती है ऐसा यदि मानकर चलें तो भी आत्मा याने क्या ?  यह सवाल खडा होता है।   आत्मा याने बिना शरीरवाला आत्मभान है क्या ?

संमोहन का प्रभाव से कुछ लोगों को उनके अपने पूर्वजन्म की कुछ घटनाएँ स्मरण हो आती है यह बात पुनर्जन्म की संकल्पना दे सकती है।  असामान्य बुध्दिवाले छोटे बच्चों की बात को लिजिए। अन्य आत्माओं को फिरसे कोरी स्लेट पर प्रारंभ करना पडता है, पुनर्जन्म के वक्त असामान्य बुध्दिवालों को ऐसा नही करना पडता। उन्हें पुनर्जन्म का ज्ञान जनम से ही होता है। अच्छो आदमियों के जिंदगी में दुख और दुष्ट दुर्जनों के सुख होता है- ऐसा क्यों ?  इस बात का समाधान भी पुनर्जन्म और कर्म की संकल्पना दे सकती है। इस प्रकार पुनर्जन्म की कल्पना लोगों को कुछ बातें समझाने हेतु उपयुक्त साबित होती है।

पुनर्जन्म को ना मानते हुए भी असामान्य बुध्दि का मस्तिष्क की रचना और उसमें होनेवाली प्राकृतिक प्रक्रिया ज्यादा अच्छी तरह से लोग स्पष्ट कर सकते है।  अंत में, आदमी की या जन्मे हुए बच्चे की आत्मा उसे स्वर्ग में ले जाएगी या नर्क में और इस जनम से पहले भी कई शरीरों में घूम चुकी आजकी यह आत्मा-वाला बच्चा या ऐसी आत्मा नहीं हो ऐसा बच्चा इनमें बिलकुल भी फर्क नहीं किया जा सकता और आत्मा स संकल्पन से आदमी को जिंदगी के बारे में भी कुछ विशेष स्पष्टीकरण नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में आत्मा, उसकी अमरता। उसका बार-बार जनम लेना और उसका स्वर्ग या नरक में जाना या बीच में लटकना इन सभी निरर्थक संकल्पनाओं की तनिक भी आवश्यकता नहीं होती।

पुनर्जन्म में प्रवेश करने की उपचार पद्धति –

इस पद्धति में आजकी मानसिक समस्याओं के कारण पूर्वजन्म के अनुभवों में ढूंढे जाते हैं।  संमोहन के कारण आदमी अपने पूर्वजन्म के अनुभव याद करने लगता है। ये यादें गलत (काल्पनिक) हो सकती हैं अथवा इसी जन्म की हो सकती है। या फिर संमोहन का उपचार करनेवाले व्यक्ति के द्वारा ही जाने अनजाने सुझयी जाती है। कोई भी उपचारकर्ता इस तरह मरीज के मन में भ्रम निर्माम करता है तो इसमें कितना धोखा होता है यह बात सामान्य आदमी को भी जान लेनी चाहिए। कुछ तथाकथित यादें तो उस व्यक्ति के रिश्तेदारों के साथ जो स्नेहभरा रिश्ता होता है उसे ही नष्ट करके उसे भी खतम कर डाले तो संमोहन का इलाज करते समय कितनी सावधानी बरतनी चाहिए यह बात स्पष्ट है। पुराने जीवन के अनुभव जगाने में दो प्रकार के फायदे होते है। एक तो यह शरीर उसने जो समय खर्च किया, उंस हिसाब से फीस लेता है ; जितना ज्यादा समय लगेगा उतनी ज्यादा फीस उसे मिलेगी। दुसरी बात यह है कि मरीज उसे जैसी चाहिए वैसी कल्पनाएँ कर सकता है। सत्य-असत्य साबित करने की बात ही नहीं होती। सबकुछ गुलदस्ते में। आदमी को लगता है कि उसने यह सब पहले देखा हुआ है या अनुभव किया हुआ है। इसका भी स्पष्टीकरण इस जनम के अनुभवों में मिलता है।  पुनर्जन्म की यादों की कोई जरुरत नहीं होती।

कर्म विपाक सिद्धांत –

भगवद् गीता में पूर्वजन्म संकल्पना और कर्मविपाक सिद्धांत को जोरदार समर्थन मिलता है। हिंदु धर्म में कर्म याने एक ऐसा  कानून है जिसका उल्लघंन कोई नहीं कर सकता। कई विद्वान लोग ऐसे विधिलिखित कानून को मजूंर नहीं करते। इस सिद्धांत के अनूसार हम जो भी काम करते है, वह चाहे जितना सामान्य हो फिर भी उसका फल कर्म करने वाले को मिलेगाही। अच्छे कर्म का फल अच्छा बुरे कर्म का फल बुरा फल। हिंदू लोग पुनर्जन्म को मानते हैं अत: कर्म फल एक बार के जन्म – मृत्यु की सीमा नहीं होता।  आपको जो कर्मफल भोगना है वह इस जन्म के कर्म क होगा या इससे पहलेवाले जन्म के कर्मों का।   कर्म याने नैतिक कर्मों से संबध रखनेवाला कानून।  इससे आदमी को अच्छा या बुरा कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।   और बुरे कर्मों की टालने की बुध्दी होती है।  ऐसे ही उसकी जिंदगी में उसे जो भोगना पड़ता है उसका संबंध कार्यकारण भाव से जोडा जाता है।  इस सिद्धांत के अनुसार जो कुछ भी भला बुरा घटित होता है, जो अन्याय होतो है या जो मुसीबतें आती है वे सब कर्म विपाक के कारण ही होता है।

हर व्यक्ति को उसके अपने पूर्व कर्मों के अनुसार फल मिलता है।  किसी व्यसनी आदमी ने अगर किसी बच्चे का अमानुष छल किया हो तो वह उस बच्चे के कर्म का फल होता है कि ऐसा छल उसके साथ होकर रहेगाही। नाझी ने लाखों ज्यू लोगों का संहार किया था। ज्यू लोगों के पूर्वजन्म के बुरे कामों का फल उनको मिलनाही था। कोई गुलाम मालिक को मारने से मर गया हो तो यह उसका कर्म फल इस जनम का नहीं, पहले जनम का होता है।

एटीएम में घुसकर किसी व्यक्ति ने वहाँ से पैसे निकालनेवाले आदमी का खून किया हो तो उसका कार्यकारण संबंध दो प्रकार का हो सकता है। एक तो जिसने खून किया वह पूरी तरह से खुद की इच्छा से किया होगा या फिर यह एक कार्मिक घटना हो सकती है। जिसका खून हुआ है उसे उसके इस जनम के या पूर्वजन्म के किसी बुरे कर्म का फल मिलना आवश्यक था। हिंदू लोग कहते हैं कि आदमी जब बुरा कर्म करता है तब वह स्वेच्छा से करता है और जब उसे दुख भोगना पडता है तब स्वेच्छा से उसने जो बुरा कर्म पूर्वजन्म में किया है उसका नतीजा होता है।  कर्मसिद्धांतों को  यदि हम मानें तो कोई भी व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता, हर कोई अपना-अपना कर्मफल भुगतते रहता है। वह जो कुछ भी करता है उसके लिए स्वयं जिम्मेदार न होकर हम सभी विधिलिखित के हाथों के प्यादे होते हैं। यह सिद्धांत सत्य मान लें तो हमारी गुनहगारों के प्रति जो दंडंव्यवस्था है उसे   और समाज की नैतिक व्यवस्था को मिटा देना होगा।

कर्मफल का यह सिद्धांत इतनाच महत्वपूर्ण क्यो मानते है ? क्योंकि इस सिद्धांत के अनुसार हम सब इस धरती पर कुछ अच्छा कर्म करने के लिए पैदा हुए हैं। यह अपनी पाठशाला है। अपनी तरक्की के लिए हमें कुछ पाठ पढ़ने होंगे। यह अपने पापों का नष्ट करने का स्थान है। यहाँ पर हमें अपने कर्मों का अंत करना है।  अपनी आत्मा की उन्नत्ति करनी है ऐसा कहा जाता है आत्मा कर्म यह दासों का कानून है आत्मा सर्वगुणसंपन्न, सर्वशक्तिमान परमात्मा द्वारा निर्मित इस संसार में इतना दु:ख क्यों होता है, इतने बुरे कर्म क्यों घटते है ? इनका समाधान देने हेतु उपरोक्त बातें की जाती है। कर्म याने आधिभौतिक कानून का अमल करना-ऐसा मानने से जीवन निरर्थक प्रतीत होगा। नैतिकता और जिम्मेदारी का कोई अर्थ नहीं रहेगा। आदमी ऐसे लगेंगे जैसे पशू हों। किसी निरर्थक व्यवस्था में निरंतर घटनेवाली घटनाएँ, समस्याएँ और समाधान! आपके कर्मो की वजह से आपपर मुसीबतें टूट पड़ती है। आप स्वयं को निरपराधी नहीं मान सकते।

सबकुछ चुपचाप सहनेवालों के लिए कर्म का कानून गड़रिये का कानून होता है।  फिर गड़रिया (शेपर्ड) उसका प्रचार करं तो उसमें क्या आश्चर्य ? यह कानून निष्क्रीय है, जैसी परिस्थिति होगी उसमें कोई दिक्कत पैदा न करनेवाले अन्यों के कारण अपने नसीब आये हुए भोगों कों स्वाभाविक और अटल मानकर चुपचाप सहनेवाले आदमियों के लिए ; याने गुलामों के लिए, पराजितों के लिए, पराजितों के लिए।  इस धरतीपर पहली बार जो जीव पैदा हुआ है उसका पूर्वकर्म क्या होगा ? उसे जो सुखदुख भोगने पडेंगे उसके लिए कौनसा कानून काम करेगा? ऐसा विचार किसी हिंदू के मन में कभी आता है क्या?

पुनरावतार – नास्तिक मत:

बौध्द और हिंदू जैसे पौर्वात्य धर्मों में पुर्नजन्म की संकल्पना श्रध्दा होती है। किंतु आजकल डायनेटिक्स और चॅनलिंग जैसे पुर्नजन्म केंद्रित गूढ़वादों का पाश्चात्य लोगों पर बहुत प्रभाव दिखाई देता है।  ‘न्यु एज’ नामक नए धर्म में तो पुनर्जन्म का होना एक विकृत लक्ष्य माना जाता है। पूर्वजन्म पर विश्वास  रखने से नवयुग के भूतकाल में घुसते घुसते पूर्वजन्म की यांदो को जागृत करने की उपचार पध्दति का इस्तेमाल होता है। इस जन्म के मानसिक असंतुलन के कारण पिछले जनम के अनुभव में इस उपचार पध्दति के कारण ढुँढे जाते हैं।   डायनेटिक्स कर्म और सायंटॉलॉजी के निर्माता –रॉन हब्बर्ड जी ने खुद के नये धर्म में पुनर्जन्म की कल्पना को एकदम नये ढंग से पेश किया है। किसी की समस्यांओ के कारणों को ढूंढने के लिए उसके पूर्व जनम का हिसाब रखना पड़ता है कुछ सायंटॉलॉजीस्ट उनके पूर्वजन्म में कुत्ते या ऐसी ही कोई जानवर थे।  (संदर्भ – A note on past lives in the rediscovery of the human soul)  हब्बर्ड के मतानुसार मृत्यु की यंत्रणा क्या है यह बात सायंटॉलॉजी के कारण समझ सकती है। मृत्यु के प्रक्रिया में ऐसा कुछ होता है – थेटन (याने स्पिरिट या आत्मा) शरीर से अलग हो गया होता है और वह दुसरे किसी नए शरीर की खोज में घूमने लगता है। ऐसी आत्माऐँ लोगों की इर्दगिर्दल घूमती हैं।  कोई गर्भवती नारी मिल जाये तो उसके पिछे लगे रहते है। डिलिव्हरी होते ही दो तीन मिनटं में वे नए बालक के भीतर प्रवेश कर लेती हैं। नवजात बालक जब पहली बार सांस लेता है तभी ऐसी आत्मा की प्रवेश होता है। हब्बड को ये सारी बाते समझ में आयी पर उसने कभी उनका जिक्र नहीं किया।

चॅनेलिंग भी इस तत्व पर आधारित है। परंतु वह पीछे-पीछे जाते पूर्वजन्म की यादों में फंसने से अलग होता है। मृत्यु के कारण अस्तित्व का संपूर्ण विसर्जन होना चॅनेलिंग की कल्पना में नामंजूर है। पुनर्जन्मके सिद्धांत में मृत व्यक्ति की जानकारी का कुछ हिस्सा नये शरीर के भीतर घुसता है परंतु यह नया व्यक्ति जैसे-जैसे बड़ा होगा वैसे वैसे एकात्मता का अहसास निर्माण होता है। इस में पूर्वजन्म के  अहसास का चॅनेलिंग कहते हैं। यह एहसास इस जनम की स्वसंवेदना के एहसास से पूरी तरह से अलग होता है। उदा- जे झेड नाइट इन्होंने ऐसा दावा किया है कि सन 1977 में (हजारो साल पहले) अँटलॅन्टिस में रहनेवाले एक क्रोमॅग्नन (एक मानववंश) आदमी की आत्मा ने उसके शरीर पर कब्जा कर लिया। कई शतकों तक जमा की हुई अच्छाईयाँ उस आत्मा को उन तक पहुँचाना था नाइट का भाँति दावा करनेवाले कई लोग हैं। चॅनेलिंगयाने पूरा झमेला लगता है। भूतकाल की आत्माएँ यदि किसी भी शरीर का कभी भी उस व्यक्ति का वर्तमान अस्तित्व ज्यों का त्यों रखकर घूम सकती हैं तो डब किसी आदमी को अपने  पूर्वजन्म की यादों के बारे में सुनाता है तब वे यादें पुनर्जन्म की होंगी ऐसा नहीं। किसी अलग ही आत्माने उसके भीतर प्रवेश कर लेने से उस आदमी की या जानवर की हो सकती है।

हमने कभी देखा ही नहीं ऐसे स्थान पर जाने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थान  को हमने पहले देखा है। ऐसे अनुभवों को पूर्वजन्म की य़ादें समझते हैं। मगर इन सबका समाधान इसी जनम के अनुभवों का `कारण अच्छी तरह से हो सकता है। पूर्वजन्म यादों का आधार लेने की आवश्यकता नहीं होती। स्वप्न  और असामान्य प्रज्ञावान बच्चे इनका स्पष्टीकरण मस्तिष्क की रचना और अनुवंशिक गमणा और क्रिया इनके सहारे आसानी के साथ किया जा सकता है। ऐसे  ही बुरे लोगों के हिस्से में बुरी और अच्छी बातें आती है और अच्छे लोगों के मामले में  के मामले में  भी ऐसा ही घटीत होता है। अच्छी अथवा बुरी बातों का बटवारा पूर्वनियोजित पध्दति से नहीं होता यही इसका मतलब है। हमारी बुध्दि को भी यह बात पटती है। बचपन में सुनी हुई बातों में कई बार पूर्वजन्म में प्राप्त ज्ञान का दावा किया जाता है। अयान स्टिव्हन्सन नामक मनोवैज्ञानिक ने ऐसी कई बातों को उकठ्ठा किया। ये उसके मतानुसार पुर्नजन्म की संकल्पनाको मानने का जरासा वैज्ञानिक सबूत ही है।

धार्मिक मूलतत्ववादी उत्क्रांतीवाद को नकारते है। और वे डार्विन के सिद्धांत को माननेवालों की चेष्टा करते है। मगर उत्क्रांतीवाद  के परिणामों के बारे में सोंचे तो डार्विन का  उत्क्रांतीवाद एक सत्य है ऐसा महसूस होता है मगर भौतिक स्चर पर यह उत्क्रांति याने आंतरिक सत्य की केवस मात्र छवि है ऐसा भी कुछ लोग मानते हैं।

हमेंशा पुछे जानेवाले सवाल-

सवाल – इस जनम की समस्याओं के कारणों को खोजने हेतु पिछले जनम में दुबारा जाना आजकल बहुत बढ गया है। इस संदर्भ आपकी क्या राय है ?

जवाब – चमत्कार, कालप्निक बातें जादू के प्रयोग आदी का लोगों को आकर्षण होता है। इतनाही नही तो कई तर्कविसंगत छछोरी बातें भी सुनने और देखने में लोगों को मजा आता है।  असंभव बातों पर भरोसा करके कई लोग मेहनतसे कमाया हुआ धन भी भोंदू लोगों के दीवाने बनकर गंवा बैठते हैं। अलग-अलग प्रज्ञामंड़ल  (ओरा) चक्रतुला (चक्र बॅलन्सिंग), आध्यात्मिक उपचार, स्फटिक की गोलियों पर नजर रखकर भविष्य के बारे में तर्क करना, वास्तुशास्त्र, कर्मकोला, बर्म्युडा त्रिकोन, पिरॅमिड्स, टेलिपैथी, गेलर इफेक्ट, रेकी,  आत्मा का माध्यम जैसी कई बातों के पीछे लोग पागस होते है और मीडीयावाले ऐसी बेमतलब की बातों को खाद पानी देती है। कुछ समय पश्चात लोगों को ढोल के भीतर के पोल का पचा चलता है और उनका पागलपन कम होने लगता है। पूर्व जनम में फिर से घुसना भी ऐसाही एक पागलपन हैं।

सवाल – हिंदू लोगों का पूर्वजन्म  पर भरोसा हाता है। इसके पीछे कोई सच्चाई काम करती है क्या?

जवाब – जनम लेने के बाद पहली सांस लेते ही मस्तिष्क को झटका लगता है और आत्मा की पूर्वजन्म की स्मृति विस्मृति में चली जाती है। नये मस्तिष्क में वह बहुत कम होती है पूर्वजन्म के कर्मों के अनुकार ही प्राणिमात्र का किसी भी योनि में जन्म होता है। ऐसी 84 लाख योनियों में से (स्पीसीज) मनुष्य योनि में जन्म मिलने के लिए बहुत पुण्यसंचय की जरुरत होती है। मनुष्य का  दनम प्राप्त होने पर उसका ठीक से उपयोग नहीं हो पाया तो फिर से उसी य़ोनि में जनम लेना पड़ता है। मनुष्य जनम का उपयोग इसी जन्म-मृत्यु के चक्र से बाहर पडने के लिए कर लेना चाहिए। हिंदू धर्म के लोग इस प्रकार के कई तर्क लढ़ाते रहते है।

यह युक्तिवाद कितना गलत है यह बात पहली ऩजर में ही लोगों के ध्यान में आ जाती है। नास्तिक लोग तो आत्मा के अस्तित्व को ही नाकारते हैं। मानसिक बुध्दिवादी व्यक्ति (सायको न्यूरल आयडेंटिटि) गृहित प्रमेयों के अनुसार गुण-अवगुण, स्वभाव की विशेषताएँ ज्ञान, संवेदना आदी सभी एक जनम से दुसरे जनम में मस्तिष्क में स्थलांतरित होना असंभव होता है। उस तरह उपरोक्त बातों का ट्रान्समायग्रेशन संभव है ऐसा मानना  हो तो बिहेव्हियरल न्यूरोसायन्स में आज होनेवाला अनुशंधान याने मुर्खता ही साबित होगा। तत्व की दृष्टि से सोचे तो आत्मा मानव के भीतर जाती है और बाहर निकलती है। यह सब किसी को पता भी न चले इस ढंग से होता है ऐसा मानना कैसे संभव होगा ?   जब तक कोई वैज्ञानिक पुर्नजन्म को झूठा साबित करनेवाला सिद्धांत प्रस्तुत नहीं कर सकता तबतक पूर्वजन्म की स्मृतियाँ आदि बातों को फालतू कहकर अस्वीकार करना चाहिए।

सवाल – दक्षिण भारत में कुछ लोगों रे पाल प्राचीन काल के ताडपत्र हैं जिनपर वर्तमान के हर व्यक्ति का भविष्य और पूर्वायुष्य लिखा हुआ म्लता है इस बारें में आप क्या कहेंगे ?

जवाब – पूर्वायुष्य  औरन भविष्यकथन का यह धंदा चेन्नई के पास ताम्बरम गांव में चलता है।  भूतकाल और भविष्यकाल को जानने का ढोंग रचानेवाल ये भोंदू अपने यहाँ प्राचीन ऋषियों ने द्रविडी भाषा में सिखित ताडपत्र है ऐसा दावा करते हैं। ये लोग आगे ऐसा भी कहते हैं कि पूरा लेखन गूढ लिपी में लिखा हुआ होने से केवलमात्र वे ही इसे पढ़कर इसका अर्थ बतला सकते हैं।  उन्हें केवल उस व्यक्ति का नाम, परिवार की जानकारी, गोत्र, जन्मसमय, जन्मस्थान, लिंग- यह सारी जानकारी देनी पड़ती है। इतने पर  वे लोग आपका भूत-भविष्य कथन कर सकते हैं।

इन भोंदू लोगों की एक खास कार्यपद्धति होती है। उसके सहारे वे उनके पास आनेवाले भोलेभालें लोगों की जानकारी इकठ्ठी करते हैं। उनकी सेवा के बदले में जो पूँजी वो अपने ग्राहक से वसूल करते हैं तब कहीं कुछ ताडपत्र बाहर निकालकर तुम्हें ऐसा जताते हैं कि तुम्हारे जन्म लेने से पहले ही ऋषियों ने तुम्हारा भविष्य ताडपत्र पर लिख रखा है। इन पत्रों पर तुम्हारा नाम, तुम जहाँ गए थे उन स्थानों के नाम, कामकाज और तुम्हारी आय की जानकारी पहली मुलाकात में तुम्ही के द्वारा दी हुई होती है। वही सबकुछ ताडपत्र पर लिखा हुआ था ऐसा वे कह देते हैं। ताडपत्र पर वास्तव में क्या कुछ लिखा गया है, वह कितने पुराने है इसकी छानबीन आज तक किसीने भी नहीं की। विचार करने जैसी बात है कि उनके पास संसार भर के आदमियों के भूत- भविष्य लिखी हुई जानकारी वाले इतने सारे ताडपत्रों को संभालकर रखने के लिए कितनी जगह लगेगी ?यहाँ पर आश्चर्य जनक बात यह है कि इस पूरे झमेले की वाहवाही वायुसेना के एक अधिकारी कर रहे थे और इस टोली को पूना में लाने की कोशिश भी कर रहे थे।

ऐसे भोंदू लोगों पर अपना पैसा लुटाने की लोगों की बुरी आदत होती है। उनके साथ उचित तरीके से संबंध प्रस्थापित करके मधुर भाषा में बोलना आना चाहिए। यथार्थ जिंदगी में लोग अनुभवों के बाद भी होशियार नहीं बन पाते। विवेक हमें ऐसी बातों पर भरोसा न करने की सलाह देता है।पर भोंदू लोगों मिठी मिठी बातें करके सामनेवाले को जितना लूटना संभव है उतना लूटते हैं।

सवाल – दिव्या दत्त नामक अभिनेत्री को उसके डॉक्टर भाई ने उसे हिप्नोटाइस करके उसे कई पूर्वजन्म बतलाए।  इस संदर्भ में आप क्या कहेंगे ?

जवाब –  हिप्नॉटिक रिग्रेशन में माहिर लोग ऐसा कहते हैं कि हिप्नॉसिस की वजह से तुम्हारे मन में गलत यादें घर बना लेती हैं। हिप्नॉसिस से जरिये ज्ञान और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं क्या इस बात को लेकर बहुत विवाद है। हिप्नॉसिस याने हिप्नॉटिस्ट के द्वारा मरीज के मनमें  पैदा की हुई समाधी जैसी स्थिति। मरीज केवल मात्र हिप्नॉटिस्ट ने दी हुई सूचनाओं का पालन करता है क्या ? यही सवाल पूर्वजन्म की यादों के बारें में या पूर्वजन्म का प्रतिगमन (रिग्रेशन) करने के बारे में उठा सकते है। हिप्नॉटिस्ट सूचनाएँ देकर मरीज के मन में कुछ कल्पनाएँ पैदा की हुई समाधी स्थिती। मरीज केवल मात्र हिप्नॉटिस्ट ने  दी हुई सूचनाओं का  पालन करता है क्या? यही सवाल पूर्व जन्म की यादों के बारे में  या पूर्वजन्म  का प्रतिगमन (रिग्रेशन)  करने के बारेमें उठा सकते है। हिप्नॉटिस्ट सूचनाएँ देकर मरीज के मन में कुछ कल्पनाएँ बोने का और उसमें से कई कल्पित बातों की निर्मिति करने की कोशिश करता है।

वास्तव में, पर्यायी उपचार पध्दति में धर्म, गूढवाद, लोककथा, आपरा मनोविज्ञान, भ्रामक विज्ञान और वैद्यकीय बातों का रसायन होता है। उसमें सैध्दांतिक दोष खचाखच भरे रहते हैं। स्फटिक में दैखना, रंग चिकित्सा, गंध चिकित्सा, जलोपचार, पूर्वजन्म में प्रतिगमन आदि बातों को आये दिन प्रयोगसिध्द समझकर अनेक सालों तक  इस्तेमाल होनेवाली उपचार पध्दति का अंग माना जा रहा है। दिव्या दत्त और उसके जैसे अन्य लोग इन उपचारों के शिकार हो रहे हैं। जादू करने जैसे लगनेवाले ये उपचार अंधे बनकर अपना लेने  से क्या परिणाम हो सकता है यह बात किसी भी विवेकवान आदमी के ध्यान में तुरंत आ जाती है।

सवाल  – पूर्वजन्म में ऐसा प्रतिगमन करना संभव है ऐसा तुम्हें लगता है क्या ?

जवाब  – पूर्वजन्मप्रतिगमन यह क फालतू उपचार पध्दति है। उसे हमें नही अपनाना चाहिए। अमेरिका में तो इस पध्दति के कारण काफी वाद विवाद हुए। अपने बच्चों के पूर्वजन्म के बारे में मिली हुई जानकारी के कारण बहुत से अभिभावकों को कई यातनाएँ सहनी पडी क्यों की उनके साथ कुछ लोगों ने बुरा व्यवहार किया। कारावास भी भुगतना पड़ा। अपनी जादूई जुबान से लोगों को वे वश में कर लेते हैं।   इनके लिए बीमारी याने कुछ सीखने का मौका होता है। असंभव बातें याने चुनौती। कल्पना विलास याने उद्योग, श्रध्दा याने टिकट और मृत्यु याने अवस्था बदलना होता है। अत: इनसे सावधान रहना चाहिए।