असाधारण दावों

परिवहन (चॅनलिंग)

जिसे पहले परलोक विद्या अथवा मृत व्यक्ति से संपर्क साधना, माध्यम ऐसा कहा जाता था उसे आजकल चॅनलिंग कहते हैं l

इस प्राचीन कला का पुनर्जन्म सन १८४८ में मार्गारेट और केट फॉक्स इन ११ और ९ साल वाली लडकियों के कारण हुआ।  न्युयॉर्क में स्थित उनके ‘हाइड्स  व्हिल’ इस मकान में किसी आत्मा ने उनपर कब्जा करने का अनुभव उन्हें आया।  धक्के भी लगे।  टेबल, कुर्सिया हिलने लगी।  संक्षेप में, जिसे हम भानामती कहतें हैं – उसका अनुभव आने लगा।  इन फॉक्स बहनों को खूष ख्याति मिली।   बे बहनें उन मृत व्यक्तियों को चुनौती देने का जाहीर कार्यक्रम करने लगी।  उनके सामने बैठे हुए लोगों के मृत रिश्तेदारों का तना सही वर्णन वे करने लगी कि लोग अवाक हो जाते थे।  एडमंड सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिश।  फेतमोर कूपर प्रसिध्द लेखक।  इनके जैसे लोग भी उनके शिष्य बन गये।  इस प्रदर्शन के बाद इंग्लंड और अमेरिका इन दो देशों में परलोकविद्या का प्रचार बढ़ता गया।  मगर सन १९८८ के अंत में मार्गारेट फॉक्सने एक आम सभा में यह कुबूल किया कि उसके भीतर की परलोकविद्या और अध्यात्मिक शक्ति और अनुभव आदि से लेकर अंत तक केवल ढोंग था।  यह सब उसने कैसे निभाया इसका उसने प्रत्यक्ष प्रयोग भी बतलाया।  उसी साल उसकी बहन ने भी ऐसी ही कबूली दी थी।  मगर चॅनलिंग या परलोकविद्या का मृत व्यक्ति की आत्मा के साथ संपर्क प्रस्थापित कर सकनेवाले माध्यमों के नगारे बजते ही रहे।  मार्गारेट की परिस्थिती बदल गई।  मीडियावालों ने उसे कबूली वापस लेने के लिए कहा।  ऑर्थर कोनन डॉयन यह लेखक भी मार्गारेट के पीछे लगा हुआ था।   शेरलॉक होम्स लिखते-लिखते उसकी प्रतिमा खत्म हो गयी थी शायद हॅरी हाँदिनी नामक जादूगर को लग रहा था कि अपने मन में भी परलोक विद्या के प्रति श्रध्दा जाग्रत हों।  उसने मन में अपनी माँ के प्रति बहुत प्यार था।  उसने अपनी माँ को मिला देनेवाले मीडीया की खोज में २० साल व्यतीत किये।  इसी झंजट में एक के बाद एक ढोंग खुलने लगा।  वह अब संतप्त हो गया।  उसने तय किया कि मरने के बाद परलोक से अपनी पत्नी के साथ संपर्क कि नहीं इस बात का अंदाजा लेने के लिए एक खास शब्द मन में ठान लिया।  पत्नी ने भी उसके ने भी उसके जैसे मीडीया को खोजा पर सबके सब ढोंगी निकले।

आजकल मीडीया को चॅनलिंग कहते हैं l उनका काम भी आये दिन अलग से होता हैं l ये व्यक्तिगत संपर्क प्रस्थपित नहीं करते तो संपूर्ण मानव जाति को किसी पुराने जमाने के त्रुषिंयों का संदेश देने का महान कार्य करते हैं l ३५००० सालों पहले राम्हा नामक एक महान आत्मा का संदेश देनेवाली चॅनलर थी श्रीमती नाईट।  निकट भविष्य में इस संसार में बहुत भयंकर परिवर्तन होंगे जैसे कि समुद्र के पानी का लेव्हल २०० मीटर से बढेगी।  इस प्रकार की भविष्यवाणियाँ वे करती थी।  अपने दुर्भाग्य से ग्रीन हाऊस के इफेक्ट से समुद्र की लेव्हल २०० मीटर तो नहीं पर कुछ हद तक बढ़ रही हैं l मनुष्यनिर्मित प्रकृति का ये –हास हैं l इस मामले में विज्ञान बीच में आ जाय तो सही समस्या की ओर से हमारा ध्यान विचलीत होगा।  वैज्ञानिक सत्य़ को जाने बिना जनता में गलतफहमिय़ाँ ही फैलेगी।

भूतों के बारे में पूछे जानेवाले सवाल –

  1. सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं में प्राचीन काल से भुतों के बारे में भय था और आज भी है इसके बारें में आपकी क्या रोय है ?

भुतों के बारें में हर आयु के स्त्री-पुरषों में बहुत कौतुहल होता हैं l क्रिकेट को छोड दे तो यही एक ऐस विषय है कि जिसपर हर किसी को कुछ ना कुछ कहना होता हैं l किसी भयानक घटना का वर्णन ऐसे करना चाहिए जैसे कहनेवाली व्यक्ति खुद वहाँ मौजूद थी।  सच कहे तो ज्यादा गहराई में जाकर सवाल पूछने पर पता चला की वह पूरी जानकारी केवल सुनी सिनायी हैं l किसी के मुख से कभी तो सुनी हुई। मगर आश्चर्य इस बात का है कि संसारभर की भुतों की कहीनियों  बहुत समानचा होती हैं l एक बात हमें जो ज्ञात है वह यह कि कोई मरा हुआ होता हैं l दुर्घटना से ह्दयगति रूक जाने से या वृध्दावस्था से।  मरने के आत्मा देह छोड देती हैं l मरा हुआ आदमी यदि पुण्यवान होगा तो उसकी आत्मा स्वर्ग में और पापी हो तो उसकी आत्मा नरक में जाती हैं l जिनकी इच्छाएँ अतृप्त रह चुकी हों या जो थोडे पापी थोडे पुण्यवान हो तो ऐसे बीचवाले व्यक्ति स्वर्ग और नरक के बीच में लटकते हरते हैं l यही अतृप्त आत्माएँ याने भूत गिरे हुए मकान, पुराने सूनसान किले और जंगल अथवा पीपल के वृक्षों पर वे रहते हैं l अमावस्या- पूर्णिमा के दिन उनकी भी मनुष्यों जैसी पार्टी होती हैं l वे केवल रात में ही भोतन करते हैं l उनकी भी पंसद-नापंसद होती हैं l मटन, चिकन, पाव लोणी, या फिर अपनी – अपनी संस्कृति के अनुसार उनकी अलग-अलग रूचियाँ होती हैं l

एक बात सर्वत्र सरिखी होती हैं l हम सब ऐसा मानते हैं कि भगवान का नाम ले लिया राम नाम लेते रहें कि भूत भाग जाते हैं l हरेक को १००% भरोसा होता है कि  भुतों को चेहरा नहीं होता, ऑखें छाती पर होती है, छाया नहीं होता।  उन्हें आईने में अपनी छवि नहीं दिखाई पडची।  उनके पाँव उलटे होते हैं – इस बारें में किसी के मन में कोई शंका नहीं होती, संशय नहीं होता।

  1. भूत होते हैं ऐसा आप मानते हो क्या ?

सजीव सृष्टी में कई जातियाँ हैं l भूतों की जाति उनमें नहीं होती।  भूत होते हैं पर अपने मन में। अपना मन भुतों की जैसी कल्पना करता है वा दो प्रकार की होती है माया के कारण तयार होनेवाले भूत – यह हुआ आत्मवंचना जानबूझकर किया हुआ ढोंग होता है या फिर सांस्कृतिक अथवा सूचनाओं के दबाव के नीचे होनेवाला बर्ताव होता है या फिर इंद्रियजन्य कल्पनाएँ होती हैं l हैं l इनमें से एक या अनेक कारणों की वजह से अपने मन में भूत आकार लेते हैं l ढोंगी लोग भोलेभाले लोगों को अपने स्वार्थ के लिए भूत होने की बात भली भाँति उनके मन में भर देते हैं l बचपन से ही हमें भुतों की कथाएँ सुननी पडती हैं l इसलिए वे होते भी है या नहीं ऐसी शंका भी मन में नहीं आ पाती औप हम लोग उनकी अस्तित्व पर विश्वास करते हैं l सूचनाएँ अमल में लाने के लिए मानवी मन तैयार रहता हैं l विज्ञापनों का यह पूरा संसार अपने मन पर ही तो टिका रहता हैं l सूचनाओं के अनुसार हमारा बर्ताव बदलता हैं l हमें यदि कोई दावे के साथ भूत है ऐसा कहें तो हम उसपर विश्वास रखते हैं l अपने इंद्रियोंद्वारा मह ज्ञानप्राप्ति करते हैं पर कई बार मह लोग केवल कल्पनाएँ करते रहते हैं l रस्सी को ही सांप समझते हैं l इन्हीं द्रियों की वजह से हम जो अस्तित्व में है ही नहीं ऐसे भुतों को हम ऐसा समझते हैं l सायकॉसिस नामक मानसिक बिमारी के कारण भी भुतों पर विश्वास हो जाता हैं l मस्तिष्क के कार्यों में गड़बड पैदा हो जाने के बाद अन्य किसी भी बाहरी कारणों के बिना भी भुतों का अस्तित्व महसूस होता हैं l

३) परासामान्य (पॅरानॉर्मल) कृती के बारें में लोग बहुत कुछ बोलते रहते हैंl कई लोग तो ‘भुतों ’ को हमने देखा है, ऐसी बात शपथपूर्वक कहते हैंl आपको ये बात सच लगती है क्या?

कल्पना कीजिए।  तूम्हारे बेडरूम में आधी रात के समय किसी के पैरों की आवाज जोर से आती है तो अपने कमरे में कुछ तो गलत हो रहा है ऐसा लगता है।  सांसों का आभास होता है और भी ज्यादा बुरी पात याने स्वयं बलहीन हो जाते हो।  उंगली भी हिला नहीं पाते।  पैर तुम्हारे समीप आने लगते हैं, तुम्हें कोई स्पर्श करता है, किसी का हाथ तुम्हारे शरीरपर हलके घूमता है।  तुम बिलकुल निश्चल होते हो।  केवल मात्र सांसे चलती हैं l तुम्हारी आँखे खुल नहीं पाती।  ऐसा लगता है मानों तुम हवा में तैर रहे हो और सबकुछ खत्म होता हैं l थोडी देर के बाद तुम सचेत होते हो।  हमेशा की तरह हलचल करते हुए जाग जाते हो।  कमरा अब भी शांत और अंधेरे से व्याप्त होता हैं l यह विचित्र अवस्था याने मज्जातंतू की एक अवस्था होती हैं l एसे नींद में होनेवाले स्लीप पॅरालिसिस कहते हैं l यह घटना सत्य ही हैं इसलिए भुतों का अस्तित्व भी सत्य ही हैं l उडनेवाली तश्तरिंयाँ या मंगल ग्रह पर से आनेवाले जानवरों के कारण अपहरण – इस तरह के परा-सामान्य अनुभव आते हैं l

४) आपको जिनके बारे में जानकारी नहीं है ऐसी कई बातें धरती पर होते रहती है, भूत भी वैसे ही नही हो सकते क्या ? संसार में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं कि जिनका स्पष्टीकरण अब भी नहीं कर सकते पर भुते पर भरोसा करना मानसिक विकार हैं l उसका अध्ययन और अधिक होना चाहिए ऐसा वैज्ञानिक कहते हैं l मनोविज्ञान, मनुष्यों का बर्ताव, मज्जाशास्त्र, मस्तिष्क का कार्य इनके अनुसंधान से यह बात समझ में आती है कि भुतों का मनुष्य के  मन में कल्पना के रूप में अस्तित्व होता है, बाह्यजगत् में उनका अस्तित्व नहीं होता।

५) एखाद आदमी की दुर्घटना में मौत हो जाने पर सकी अतृप्त इच्छाओं के कारण इधर उधर भटतनेवाली उसकी आत्मा भूत बन जाती है यह बात सच है क्या ?

अश्मयुग में भूतों की कल्पना ने जन्म लिया होगा।  यह कल्पना याने आदि मानव का सपना और जीने मरने के बीच का फर्क जान लेने की एक कोशिश रही होगी।  समय के साथ साथ इस कल्पना में परिवर्तन आता गया पर वह कल्पना टिक रही क्योंकि कई लोगों को इस कल्पना की वजह से मृत्युभय से थोडी राहत मिलती हैं l विज्ञान के प्रगति के कारण मानव जीवन याने प्राकृतिक रूप में भौतिक प्रक्रियाएँ होती है और उसमें किसी अति भौतिक शक्ति का अस्तित्व मानने की आवश्यकता नहीं यह बात स्पष्ट हो चुकी हैं l इस नैसर्गिक प्रक्रिया में से आत्मा के जैसी अतिनैसर्गिक तत्वों का सृजन होना असंभव है यह बात सभी मानने लगे हैं l हम पूरी तरह से नैसर्गिक पध्दति से बने हुए हैं और अपने भीतर कोई अतिनैसर्गिक अंश नहीं है ऐसा मानने के लिए पूरा सबूत हैं l आत्मा का अस्तित्व यह बात भूत मानने के लिए आधार बन जाती हैं l आत्त्मा ही काल्पनिक होने के कारण उसका और भुतों का भटकते रहना काल्पनिक ही होगा।

६) लोग देवदूतों और परियों के बारे में भी बोलते रहते हैं l इस संदर् में आप क्या संदर्भ में आप क्या कहोगे ?

जब आपने स्वर्ग का अस्तित्व मान ही लिया है तब परियाँ और देवदूत उसके साथ आ जाते हैं l परंतु मूल में यदि स्वर्ग ही नहीं होगा तो तुम्हारा मनोरंजन करनेवाली परियाँ भी नहीं होगी।  १९ वी सदी में इन परियों और दिवदूतों के बारे में बड़ी गरमागरम चर्चाएँ हुआ करता थी।   शेरलॉक होम्स के लेखक आर्थर कॉनडायल भी उनके बगीचे में किसी एक फोटो में दीखनेवाली परियाँ सही है ऐसा समझते थे।  वह फोटो नकली है यह बात उनके जादूगर मित्र हॉदिनीजी ने उन्हें सिध्द करके दिखलाई तब उनकी गलतफॅमिली दूर हुई।  वह फोटो दो लडकियों ने कुछ गडबड करके निकाला थी।

७) प्लँचेट के जरिए भुतों को बुलाने के बारे में लोग बोलते  रहते हैं, इस बारे में आपकी क्या राय है?  मेरी दादी गुजर गयी वह घटना मुझे हमेशा याद आती हैंl वह हमें छोडकर ना जायें ऐसा हमें लगता था।  इसलिए भुतों की कल्पना मुझे अच्छी लगती थी।  उनके जरिए में दादी के साथ बोल सकूंगा ऐसा मुझे लगता था।  हमें भूत काल से जोडने वाला साधन याने भूत।  अपनी जबरदस्त इच्छा होती है कि भूत होना ही चाहिए।

अपनी इस प्रबल इच्छा का उपयोग ये ढोंगी चॅनलर करते रहते हैं l हमें हमारे प्रिय व्यक्ति के साथ वे संपर्क जोड़ कर देंगे ऐसा आश्लासन देते हैं l मृत व्यक्तियों के साथ मरणोत्तर संबंध बनाये रखनेका हमें जन्मसिध्द अधिकार प्राप्त है – ऐसा भी ये लोग कहते हैंl विवेकवादी लोग जब इनके कारनामों की खोज कर चुके तब ध्यान में आया कि भोलीभाली जनता के दु:खों और भावनाओं को भाडंवल बना कर ये लोग उन्हें चूसते हैं l यह एक बडा षड़यंत्र हैं l

प्रेतग्रस्त मकान और भुतों का दीखना

भूत दीखने की घटनाएँ याने हमारी प्रतारणा होती हैं l ऐसा सभी वैज्ञानिक मानते हैं l पर कॅनडा, इंग्लंड आदि जगहों पर कोई मकान भूतों होने का आभास जब वहाँ के लोगों को होता है तब उनके मस्तिष्क में क्या कुछ घटता होगा इसका शोध कहाँ के वैज्ञानिक लगा रहे हैं l उन्हे पता चला कि भुतों में स्खित विघुतचुबंकीय क्षेत्र में (इलेक्ट्रोमॅग्नेटिक फील्ड EMF) बहुत उतार चढाव होते हैं और कानके द्वारा सुनाई न देनेवाली अश्रवणीय (इन्फ्रासोनिक) ध्वनिलहरी उत्पन्न होती हैं l बिजली के तार के कारण होनेवाले इलेक्ट्रोमॅग्नेटिक फील्डस, रेडियो, घडी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक चीजों के कारण व्यक्ति या मकानों पर कुछ असर होता है, और उन्हें सिध्द करने की बात मायकेल पर्सिजर नामक न्यूरो सायंटिस्ट कहते हैं lसन २००१ में परसेज्युअल अँड स्किल्सडक नामक क्रोनकला में किसी किशोरवयीन लडकी के अनुभवों का वर्णन किया गया था।  उसका दावा था कि उसे सन १९९६ में रात के समय होली स्पिरिट्स से मुलाकात होती थी।  इसमें से एक मुलाकात लैंगिक थी।  १७ वर्षीय इस लडकी को जनमतेही मस्तिष्क में कुछ तकलीफ थी।  उसके बाये कंधे पर एक बच्चा है ऐसा उसे निरंतर आभास होता था।

पसिंजर और उसके सहकारियों ने उस लडकी के माँ के कहने से इस बातकी खोजबीन की।  तब उन्हें पता चला कि उसकी चारपाई के पास एक इलेक्ट्रिक घड़ी थी वह सो गई थी तब घड़ी उसके माथे के पास केवल १० इंच दूरी पर थी।  उस घड़ी के इलेक्ट्रोमॅग्नेटिक लहरों के कारण उसको झटके आते थे और वह दृश्य दिखाई पडता था  – ऐसा खोज लगा।  घड़ी को वहाँ से हटाते ही वह दृश्य दिखना बंद हो गया।

वह घड़ी और लडकी के मस्तिष्क को होनेवाली तकलीफ इसकी वजह से स्पिरिट उससे मिलता था।  पसिजंर को भलेही यह वात जँच रही हो फिर भी बिजली के चुबंकीय क्षेत्र के कारण इस प्रकार के अनुभव आते हैं इस सिध्दान्त को लेकर कुछ शंकाएँ शेष रहती ही हैं l ख्रिस्टोफर फ्रेन्च नामक मनोवैज्ञानिक ने  सिध्दांत की जांच करने के लिए कुछ प्रयोग किये।  उसने अपने सहयोगियों की मदद से लड़ंन में क भुतों का कमरा बनाया।  उसमें इलेक्ट्रोमॅग्नेटिक स्रोत और इन्फ्रासाउंड जनरेटर रख्खा गया।   ७९ लोग स्वेच्छा से उस ठंढे और हलकी से रोशनीवाले कमरे में कुछ समय के लिए रहने को राजी हो गए।   प्रयोग करनेवालों ने उन्हें बताया कि इस कमरे में कुछ तो विचित्र और अभद्र है ऐसा महसूस करेंगे।    कौनसा आदमी कितनी गहराई से इस बात को आत्मसात करता है इस बात का मूल्यांकन भी किया गया।   उसमें से तुरंत विश्वास रखनेवाले और संशयवादी लोग अलग से पहचान गए।

इस खोजबीन से उठे कुछ सवास – मृत्यु के बाद के अस्तित्व पर विश्वास है क्या ?  आगे क्या होगा इस बारे में पहले ही कुछ अंदाजा हो जाता है क्या ?  ऐसे कुछ सवाल पूछे गये थे कमरे की दीवारों के पीछे रखे एक कम्प्युटर के कॉइल्स की जोडी में से संशोधक इएमएफ पल्सेस निर्माण कर रहे थे।  साथ ही अश्राव्य ध्वनिलहरियाँ भी निर्माण की जा रही थी।  उनके कारण भुतों का होने का अहसास हो सकता है।  ऐसे ही संशोधन पर सन १९९८ में ‘द घोस्ट इन द मशीन ’ नामक लेख ‘जनरल ऑफ द सोसायटी फॉर फिजिकल रीसर्च ’ स मासिक में प्रकाशित हुआ।  उसमें संशोधक व्हिक टँडी, और टोनी लॉरेन्स ने एक प्रयोग के बारे में लिखा है।  इस प्रयोग में उन्हें किसी फॅक्टरी में इंफ्रासांऊड वेव्ह जनरेट होते हुए दिखाई पड़े।  इस फॅक्टरी में काम करनेवाले मजदूरों को पॅरानॉर्मल अनुभव आ रहे थो।  ख्रिस्तोफर फ्रेंच को सहयोग करनेवाले कुछ लोगों को ऐसीही इएमएफ पल्सेस, अश्राव्य ध्वनियों का सामना करना पड़ा।  कुछ तो अलग लग रहा था, चक्कर आ रही थी और कई लोगों को बहुत डर लग रहा था।  फ्रेंच कहते है – ‘ बहुत डर लगता यह बात बहुत अलग सुनने को मुली’।  हमें तो थोडा अलग महसूस होने की बात अपेक्षित थी।  उतना सब कुछ होने के बावजूद भी भुतों का आभास होता है यह बात फ्रेंच साबित नहीं कर पाये।

फ्रेंच ने ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक जेम्स इ. असकॉक की किताब ‘सायकॉलॉजी : सायन्स और मॅजिक’ (१९८१) पढने के बाद उन्हें अतिसामान्य मानसशास्त्र में दिलचस्पी पैदा हुई और एक कर्तव्यनिष्ठ वैज्ञानिक के नाते उन्होंने इस क्षेत्र में रस लिया।  इग्लंड में जगह जगह पर स्थित प्रेतगस्त या भुतों के मकानों की वे स्टडी करने लगे वे कहते हैं – भुतों पर भरोसा करनेवाले लोग एक दूसरे का विश्वास बढ़ाते हैं।  गहरे अंधेरे में अगर हम बैठे हों तो कुछ ध्वनियाँ हमें सुनाई देती है।  ऐसे मकानों में ये ध्वनियाँ सुनाई देना आम बात है।  मगर भुतों पर विश्वास रखने वालों को जो ध्वनियाँ नहीं होती वे दी उन्हें सुनाई देती हैं और अंटशंट कुछ भी दिखाई देता है।  हमारे रेकॉर्डिंग के साधनें से यह बात समझ में आयी।  फ्रेंच की खोज का रिपोर्ट ‘कॉन्टेक्सड’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है।  इसी का पिछा करने हेतु वे और उनके सहयोगी चंदा इकठ्ठा कर रहे है।  यह बात आसान नहीं है।  भुतों के किस्से और कहानियों की पोल खोलने में विज्ञान का महत्व नहीं होता।  किंतु फ्रेंच के कथनानुसार इस खोजबीन के कारण आदमी के मन के बारे में, स्मृतियों  और भ्रमों के बारे में कई सच्चाईयाँ सामने आ सकती हैं।  मनोविज्ञान में आजकल  रिअँलिटी  मॉनिटरिंग का बोलबाल है।  आदमी के मन मं घटनेवाली घटनाएँऔर बाहर के यथार्थ जगत् में घटनेवाली घटनाएँ इनमें हम फर्कबता सकें इस बारे में प्रयत्न हो रहे हैं।  – हम लोग मानकर ही चलते हैं।  तुम बिस्तरपर जाने से पहले सचमुच दरवाजा बंद करके आये हो या केवल दरवाजा बंद करने की बात सोची थी ? इसीका दूसरा छोर होता है – सीझोफ्रेनिया ? इस मानसिक बीमारी में सत्य और कल्पना में मस्तिष्क फर्क ही नहीं कर पाता ? सत्य और कल्पना में फर्क कर सकना और फर्क करना मुश्किल होता है इसमें एक कंटिन्युअम, एक संबध है।  उसका उपयोग हमें जा आभास होते रहते है उनके बारे में बोलते समय होता है।  लाग गलत आरोप करते रहते हैं।।  यथार्थ में गटनेवाली घटनाएँ याने हमारे मन की प्रक्रियाओं का फल समझते हैं।  तुम्हारे मन में क्लपित प्रसंग यथार्थ के साथ जितने मिलते हैं उतना ही सत्य और कल्पित मे फर्क करना मुश्किल काम होगा – ऐसा फ्रेंच का कहना है।

श्रध्दालू लोग कहते हैं कि फ्रेंच जैसे संदेही आदमी को भूत दिखाई देना या उनकी आवाजें सुनाई पड़ना कैसे संभव है ? इस सवाल का जवाब देते हुए फ्रेंच कहते हैं कि यह सत्य है।  मुझे विश्वास हो इसलिए भुतों को और भी गूढ बनना चाहिए।  खंडहरों में बैठने का बाद वहाँ कुछ अनोखा घटित होना चाहिए इस बात का में इंतजार करता हूँ।

फ्रेंच अपनी कल्पनाएँ सिध्द नहीं कर  पाये फिर भी पर्सिजंर उनकी टीम की प्रशंसा करते हैं।  वे कहते हैं ’अपने शरीर पर इएमएफ कई प्रकार से माथे से लेकरलहर पेशीपर, एन्झाइमपर, डीएनएपर भी परिणाम करते रहता हैं।  मस्तिष्क की प्रक्रियाओं पर होनेवाल असर परखने के लिए इएमएफ सौम्य होने चाहिए और उचित पॅटर्नमें ही उन्हें आना चाहिए।  अत: इएमएफ और  भुतों का आभास इनके संबंध को परखने की वैज्ञानिक अनुसंधान प्रक्रिया जारी रखनी चाहिए ऐसा उनका कहना है।  ‘ में एक  वैज्ञानिक  हूँ और किसी भी बात पर श्रध्दा नहीं रखता’

पूनम का चांद क्या वास्तव में विचित्र बर्ताव करवाता है ? (विकिपिडिया से – निनोमी के , सौजन्य से साभार)

कोई विचित्र घटना घटते  ही बरसों से लोग कहते हैं ‘आसमान में पूनम का चांद उग आया होगा।  रोमन चांद का नाम ही ल्यूना है।  इसीसे ल्यूनॉटिक याने पागलपन शब्द इस्तेमाल करने लगे हैं।  ग्रीक तत्वज्ञ अँरिस्टॉटल और रोमन इतिहासकार प्लिनी के मतानुसार शरीर का सबसे ज्यादा गीला अंग मस्तिष्क होता है।  इससे समुद्र में ज्वार लानेवाले चंद्रमा के हानिकारक परिणाम बहुत शीघ्र होते हैं।  युरोप में मध्याकाल में पूनम को कुछ लोगों का खून चूसनेवाले जानवरों में परिवर्तन होता है ऐसी धारणा सर्वत्र फैली हुई थी।  चंद्रमा के कारण ही पागलपन का दौरा पडता है ऐसा ही लोग समझते थे।  आज भी कई लोग ऐसा मानते है की चंद्रमा की गूढ़ शक्ति के कारण आदमी विचित्र बर्ताव करते हैं।  पागलों के अस्पताल में जाना, आत्महत्या, खून, दुर्घटना, खेलो में मारपीट कुत्तों का काटना आदि परिणाम होता है।  एक सर्व्हे के अनुसार ४५ % महाविद्यालयीन छात्रों को चांद के प्रभाव से आदमी विचित्र-सा बर्ताव करता हैं ऐसा लगता है।  मानसोपचार करनेवाले व्यावसायिक स रीझल्ट पर ज्यादा भरोसा रखते हैं।  सन २००७ में इंग्लंड के कई पुलिस डिपार्टमेंटों में गुनाह बढेंगे इस अंदाजे से पूनम को ज्यादा पुलिस देखभाल के लिए नियुक्त किये गये थे।

पानी का परिणाम –

अरिस्टॉटल और बडे प्लिनी को ध्यान में रखकर आजकल अर्नाब लायबर जैसे मनोवैज्ञानिक मनुष्य के बर्तावपर चाँद का होनेवाले परिणामों का संबध समुद्र के पानी पर चांद का जो परिणाम उसके साथ जोडते है।   आदमी के शरीर में ८०% पानी ही होता है।  अत: उसके मस्तिष्क में पानी के ऊपर यह चंद्रमा अवश्य ही छेडखानी करता होगा।

मगर इस दलील में पानी नहीं है ऐसा कहने के पीछे तीन कारण हैं।  एक है चंद्रमा का गुरूत्वाकर्षण ऐसा कोई परिवर्तन करने में बस नहीं होता।  फिर स्वभाव में फरक पड़ने की बात तो दूर की है।  कॅलिफोर्निया विश्वविद्यालय के स्वर्गवासी ज्योतिषी जॉर्ज एबेल के मतानुसार तुम्हारे हाथ पर बैठे हुए मच्छर का गुरूत्वाकर्षण चंद्रमा के गुरूत्वाकर्षण से भी ज्यादा होता है।  परंतु क्सी पर भी मच्छर का असर (मॉस्किटो ल्युनसी) हुआ है यह बात सुनने में नहीं आयी।

दुसरा कारण ये है कि चंद्रमा के गुरूत्वाकर्षण का परिणाम समुद्र, तालाब इनके खुले पानी पर होता है।  मनुष्य के मस्तिष्क में जो बंद पानी होता है उसपर परिणाम नहीं होता।  तिसरा कारण चंद्रमा का गुरूत्वाकर्षण पूनम के जितना ही अमावस के दिन में भी उतनाही होता है मात्र पूनम को ही बढ़ता है ऐसी बात नहीं।

पूनम के इस पागलपन पर विश्वास रखनेवालों के सामने एक और समस्या होती है।  वास्तव में ऐसा कोई पागलपन का प्रकार होता है इसका कोई सबूत नहीं है।  फ्लोरिडा इंटरनॅशनल युनिर्वसिटी के जेम्स रॉटन कोलोरॅडो के रॉजर कल्व्हर र इव्हेन केली इन तीन मनो वैज्ञानिकों ने चांद का ऐसा कोई परिणाम होता है क्या यह देखने हेतु बहुत ध्यान से अनुसंधान किया।  पर ऐसा परिणाम उन्हें कहीं पर भी नजर नहीं आया।  मेटे-अँनॅलिसिस से उन्हें पता चला कि पूनम के चांद का आत्महत्या, गुनाह, मानसिक बीमारियाँ और आपत्ति केंद्रों पर किये गए टेलिफोन पर कोई असर नहीं होता।  सन १९८५ में उन्होंने ऐसे ३७ संशोधन किये ‘ मच अँडो बाउट दि फूल मून ’ (पूनम का) इस सायकॉलिजकल बुलेटिन में प्रकाशित अपने लेख में रोटन और केली ने चांद के पागलपन को अंतिम बिदाई दी और अपने निष्कर्ष में कहा कि अब इसके आगे संशोधन ना करें।  (मेटा-अँनॅलिसिस यह एक सांख्यकी कार्यपध्दति – स्टॅटिस्टिकल प्रोसीजर – है।  इसमें कई खोजों के निष्कर्ष इकठ्ठे करके बड़ा संशोधन हैं इस रूप में इसका उपयोग होता है।)

कुछ ज्ञानी लोगों को यह निष्कर्ष मंजूर नहीं है।  इस बारे में कुछ छुटपुट अनुसंधानें के निष्कर्ष वे सबूत के तौर पर पेश करते हैं।  बारीकी से देखने पर वे निरर्थक लगते हैं।  ऐसा ही एक संशोधन कुछ लेखक महोदयों ने सन १९८२ में प्रकाशित किया।  उसमें उन्होंने लिखा कि पूनम की रात में वाहनें की दुर्घटनाएँ ज्यादा होती है।  पर उसमें भी एक रहस्य था।

वे पूर्णिमा की रातें ज्यादातर सप्ताह के अंत में आनेवाली थी।  इस बात को टालकर जब दुबारा विश्लेषण हुआ तब चंद्रमा का ये पागलपन खत्म हो चुका था।  प्रारंभ कहाँ से होता है – चांद का पागलपन यह बात अगर ज्योतिर्विज्ञान या मनोवैज्ञानिक शहरी दंतकथा है ऐसा मान लों तो भी ऐसी धारणा सार्वत्रिक क्यों है यह सवाल शेष रहताही है।  उसके कई संभाव्य कारण कहे जा सकते हैं।  इसमें मिडिया की भूमिका निश्चित है।  कई हॉलिवुड, बॉलिवुड मन को झंझोरनेवाली फिल्मों में पूनम की रात में ही खून, मारपीट, गोलियाँ चलाना और अन्य मन की विकृतियों वाली घटनाएँ घटित होते हुए हमेशा दिखाई जाती है।

कई बार दो बातों में बिना कारण संबंध जोडा जाता है।  जोडों का दर्द जिन्हें हैं वे लोग ठंड़ में रहें तो उनका दर्द बढ़ जाता हैं ऐसी शिकायत करते हैं।  पर संशोधन के बाद यह सत्य नहीं है इस बात का पता चला है।  गर्मी के दिनों में बड़ी सडकों पर मृगजल दिखने जैसा भ्रामक प्रकार है यह !

घटी हुई घटनाएँ आदमी को ज्यादा अच्छी तरह से याद रहती हैं और उनकी तरफ ध्यान भी ज्यादा जाता है।  पूर्णिमा के रात में कोई विचित्र घटना घट जाये तो वह हमें अच्छी तरह से याद रहती है और हम उसके उसके बारें में औरों के साथ बोलते भी हैं।  क्योंकि यह संबंध हमारे पूर्वग्रह से मेल रखता है।  इस बात पर भरोसा रखनेवाले मानसोपचार विभाग में काम करनेवाली परिचारिकाएँ पूनम के रात में अपने पेंशट्स के विचित्र व्यवहार के बारे में बहुत कुछ लिखकर रखती हैं ऐसा किसी एक संशोधन में नजर आया है।    और किसी पूर्णिमा के दिन कुछ विचित्र न घटें तो वह  सबकुछ भूला दिया जाता है।  अपनी इस प्रकार की चुनींदा स्मृति के कारण हम पूर्णिमा और विचित्र व्यवहार इनमें (जोअसल में है ही नहीं उनके साथ) संबंध जोडते हैं।

इतना सबकुछ होने पर भी यह गलतफहमी कैसे शुरू हुई एस बात का समाधान नहीं मिल पाता।  इस मामले में एक कल्पना चाल्स एल। रायसन नामक मनोवैज्ञानिक ने प्रस्तुत की है।  कथनानुसार पुर्णिमा के कहे गए परिणामों में थोडा सच होना संभव है।  किसी समय में ऐसा होता रहा होगा।  आधुनिक काल में घर के बाहर भी बिजली का प्रकाश होता है पर इससे पहले पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की झिलमिलाती रोशनी के कारण घर के बाहर रहनेवालों (इसमें पागल लोग भी होते हैं ) की नींद उचट जाती होगी।  कुछ विशिष्ट मानसिक अवस्थावाले लोंगो (बायपोलर डिसऑर्डरवाले) में निद्रानाश के कारण विचित्र बर्ताव हो सकता है।  इसीमें से पूर्णिमा और मानसिक बीमारी का संबंध जोड़ा गया होगा।  इसेही वे कल्चरल फॉसिल या सांस्कृतिक दकियानूसी कहते हैं।  यह चतूर स्पष्टीकरण सच है या झूठ यह समझना असंभव है।  ऐसा कहना एकदम गलत माना जाता है।  यह बात तो ऐसी प्रतीत होती है जैसे कोई पागल कह दें कि चाँद तो हरी चीज का बना हुआ होता है।

आत्मा की संकल्पना

आत्मा यह संकल्पना ही मानसिक दृष्टी से बहुत मूल्यवान है।  इसी कारण आदमी के मन में यह संकल्पना युगयुग से टिकी हुई है।  हम अमर नहीं है यह अहसास और कभी ना कभी हमारा अंत होगा इस बातका भय केवल आदमी को ही हो सकता है।   क्योंकी इस धरती पर जितनी भी सजीव सृष्टि है। उनमें बुध्दि केवल मात्र मनुष्य को मिली हुई है।  सभी मानवों में अमर होने की इच्छा होती है।  फिर भी आत्मा यदि अविनाशी है तो यह  बाहरी शरीर छोड़ने के लिए याने मरने के लिए लोग तैयार रहते हैं।  अमर बनने की उनकी आशा कुछ हद तक आत्मा की संकल्पना के कारण सफल होती है ऐसा उन्हें लगता होगा।

मानववं      शशास्त्रज्ञ सर एड्वर्ड बर्नट टायलर के मतानुसार जीवात्मवाद के कारण धटनाओं का स्पष्टीकरण दिया जा सकता है।  स्वप्न और आभास इनका स्वरुप, जिंदा होना और मरना इनका भेद इन समस्या को बुध्दि को आधार पर सुलझाया जा सकता है और ऐसी अन्य कई बातों को जैसे कि आशा, भय आदी को भी प्रतिपादित किया जा सकता है।  अपने जीवन से संबंधित अपने रिश्तेदारों की जरुरतें पूरी कर सकते हैं।

पुराणश्मयुग में (पॅलिओछिक इरा) स्वप्न का स्वरुप समझने हेतु और जीवन मृत्यु के भेद को समझने के लिये उस जमाने में आदमी को ‘आत्मा’ यह कल्पना सूझी होगी।  आगे चलकर  इस कल्पना में फर्क पड़ता गया फिर भी याज तक वह कल्पना टिकी हुई है।  कई लोगों का मृत्यु का भय आत्मापर जो श्रध्दा बनी हुई है, उससे बहुत कम हो जाता है।  आधुनिक विज्ञान में जो तरक्की हुई है उसके जरिए कुछ और गुत्थियाँ सुलझ गयी है।

अब हमें लगता है कि जिंदगी का पूरा स्पष्टीकरण कुछ प्राकृतिक शरीर प्रक्रियाएँ हमें दे सकती है।  इसकेलिए हमें किसी चैतन्यशक्ति की कल्पना करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।  अब हन लोग ऐसा भी मानने लगे हैं कि मनुष्य के साथ-साथ संपूर्ण जीवसृष्टि जैविक उत्क्रांति के कारण ही निर्माण हुई है।  और इससे प्राकृतिक प्रक्रिया आत्मा के जैसी आधिभौतिक वस्तू का निर्माण होना संभव ही नहीं।  अत: यह संपुर्ण सजीव सृष्टि अपने आप बनी हुई है, इसमें किसी अलौकिक या असामान्य तत्व होना संभव ही नहीं।