वास्तु शास्त्र

भ्रामक शास्त्र – लगभग पिछले 20-25 सालों से अपने यहाँ के सुशिक्षित लोगों को प्राचिन भारत के वास्तुशास्त्र के प्रति रूचि पैदा हो चुकी है। सैंकडों सालों से इतिहास बना हुआ यह शास्त्र 80 वें दशक में अपना अस्तित्व फिर से जताने लगा है। वास्तुशास्त्र जब पर्दे के पीछे था तब भी बिल्डींगे बनाते समय इस देश में वास्तुशास्त्र का आधार लिया जाता छा। अब तो वास्तुशास्त्र बहुत लोकप्रिय हो चुका है। जो कोई इस शास्त्र के अनुसार वास्तु का निर्माण करता है, और इस शास्त्र के अनुसार बनी हुई वास्तु में रहता है उसे यश, आरोग्य, सुख, समृध्दि सबकुछ निश्चित प्राप्त होता है ऐसा प्रचार किया जा रहा है।

यह शास्त्र पूरी तरह से विज्ञाननिष्ठ है सा इस शास्त्र का दावा है जिने हमें जाँचकर देखना। विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोन का एक महत्वपूर्ण तत्व  है। सही ज्ञान हमें ज्ञानेंद्रिय के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसी तत्व के अनुसार धीरे-धीरे वैज्ञानिक पध्दति निरीक्षण, अन्वेषण, प्रयोग अनुमान – निष्कर्ष जैसी सीढ़ीयों को पार करके सिध्द हो सकती है। ज्ञानप्राप्ती की यह सर्वाधिक विश्वसनीय पध्दति है।

इस पध्दति से पूरा ज्ञान परखा जाता है। उसकी सत्यता और असत्यता तय की जाती है। इसके पश्चात वह विज्ञान बनता है। वास्तुशास्त्र को भी विज्ञान बनने के लिये इस कसौटी को पार करना पड़ता है। इसके बिना वास्तुशास्त्र को विज्ञान मानना गलत है। वैज्ञानिक प्रगति के कारण सब चीजों का लाभ उठाना मगर विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नकारना, हमारा प्राचीन शास्त्र है ऐसा कहकर विज्ञान की कसौटी को न मानते हुए वास्तुशास्त्र को अपनाना यह दोहरापन छोड़ना चाहिए। वास्तुशास्त्र पर भरोसा करना यह व्यक्तिगत बात हो सकती है मगर उसे विज्ञान कहना याने अपने आपको और अन्यों को भी ठगाने जैसी बात है।

आधुनिक जगत मे किसी को भी विज्ञान, उससे प्राप्त सुखसुविधाएँ, उसकी विश्वसनीयता को नकारना असंभव है। वैज्ञानिक होना बहुत सम्मान और प्रतिष्ठा दैनेवाली बात है।  अत: कुछ भी करके वास्तुशास्त्र को वैज्ञानिक धरातल पर सही साबित करने की कोशिश जारी रहती है। यह शास्त्र विज्ञाननिष्ठ नहीं है इतना कह देना पर्याप्त नहीं।  कौनसी परिस्थिति में इसका निर्माण हुआ, उसकी वृध्दि कैसै हुई, उस वक्त का समाज, लोगों के व्यवहार, खान-पान आदि सारी बातों की चर्चा होनी चाहिए। मकान की जरुरत तोउसे शुरु से ही रही है। आदमी को ही नहीं, पंछी, जानवर, कीटक, चींटी सभी सजीवों को रहने के लिए स्थान लगताही है। अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार हर कोई मकान ढूँढता है या स्वयं उसका निर्माण करता है। यह सबकुछ अन्य प्राणी अपनी आवश्यकता के अनुसार सैंकडों सालों से अपना मकान बनाते आये हैं।  मनुष्यने अपनी बुध्दि का इस्तेमाल करके अपना मकान बनाने की कला में अपनी जरुरतों के अनुसार समय समय पर सुधार किये हैं।

प्रांरभ से ही मकान बनाते वक्त सुधार क्ये जाने लगे मकान बनाने का वास्तुशास्त्र केवलमात्र भारत में ही बनाया गया ऐसी बात नहीं। इस प्रकार का शास्त्र बनाना और स्थल-काल, भौगोलिक परिस्थिति, उस इलाके की हवा, वहाँ की संस्कृति, वहाँ पैदा होनोवाली मुसीबतें आदी के कारण महसूस होनेवाली अलग-अलग आवश्यकताओं के अनुसार मकान बनाने में निरंतर सुधार होते रहे। संसार भर में यह सब चलते ही रहता है।   यहाँपर ध्यान में रखने जैसी बात यह है कि आर्य लोगों की टोलियों ने आक्रमण करके वहाँ की संस्कृति को समाप्त करने के बाद भारतीय वास्तुशास्त्र वास्तुशास्त्र का निर्माण किया। वहाँ की संधोक संस्कृति की भाँति अन्य अनेक प्रगतीशील संस्कृतियों का ऐसी टोलियों ने विध्वंस किया है। ऐसे आक्रमणों से कुछ इनी-गिनी संस्कृतियों ने स्वयं को बचाया है।

ऐतिहासिक पहलु –

इस शास्त्र को विज्ञान कहें या नहीं इस बात को तय करने से पहले यह जब निर्माण हुआ उस काल की घटनाएँ और उसके परिणामों की जाँच करनी होगी। वास्तुशास्त्र के प्रवक्ता लोग कहते हैं कि इस शास्त्र का जनम वैदिक काल में हुआ है। ऋगवेद  में इसके  बारे में कुछ सबूत भी मिलते हैं। आर्य लोग भारत में आने से पहले सिंधू नदी के आसपास मूल रहिवासी बढ़िया ढंग से मकान बनाते थे। इन लोगों पर कब्जा करके अपनी सत्ता स्थापित करने हेतु आर्य लोगों को कई पापड बेलने पडे थे। वास्तुशास्त्र उन्हीं कोशिशों में से एक है। इसका मूल है यज्ञवेदी के निर्माण में यज्ञीय परंपरा और यज्ञीय विधि ज्यों ज्यों विस्तृत होते गये त्यों त्यों चातुवर्ण पध्दति मजबूत बनती गयी और  मकान बंधने के कार्य को करते समय गूढ शक्तियों को शांत करना, तृप्त करना और इसके लिए कर्मकान्ड करना शूरु हुआ। ये महाशक्तियाँ गण, गुरु, स्थपति, पुरुष आदि नामों से पहचानी जाती हैं। इसमें वास्तुपुरुष मंडल और वास्तोस्पती इन कल्पनाओं का सृजन हुआ। शुभ-अशुभ, पितर, वास्तुशास्त्र, ब्रम्ह, ईश्वर, स्वर्ग, मोक्ष, आत्मा जैसी कल्पनाओं का निर्माण इसीमें से हुआ। आर्य लोग आने से पहले सिंधू नदी के इर्दगिर्द बहुत बारीकी से नियोजन करके कुछ महानगर बस गये थे। खोदकाम के बाद इन बातों का पता चला है। वास्तुशास्त्र की वजह से चार वर्णोवली समाज रचना को बनाया गया। आजकाल जो वर्ण और जाति की व्यवस्था को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि यह दुष्ट व्यवस्था इतनी टिककर रहने के पीछे वास्तुशास्त्र का बहुत बड़ा हाथ है। निष्कर्ष के तौर पर यही कहा जा सकता है।

वैदिक ज्ञान –

वास्तुशास्त्र को मानने वाले कुछ लोग भृगु ऋषि के कुछ श्लोकों का आधार लेकर कहते रहते हैं कि वेदकाल में बहुत प्रगत वास्तुशास्त्र व्यवहार में था। बड़ी बड़ी बिल्डिंगे थी और हवाई जहाज भी थे। किसी अनुसंधान कर्ता ने उनसे एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा था। उसका जिक्र यहाँ करनाही होगा। वास्तव में अपने यहाँ प्राचीन काल से ही हवाई जहाज और आज बननेवाले शस्त्रास्त्र थे। जिन बातों को आज खोजा जा रहा है उन सबके भारत के लोगों ने वेदकाल में ही खोज लिया था आजकल जो अनुसंधान हो रहें हैं वह सब पुरातन वैदिक ज्ञान ही तो है। फिर आप मुझे बताइए कि उन्होंनं दो पहियोंवाले वाहनों को भी संशोधन किया था क्या और वे उनका इस्तेमाव करते थे क्या? यहाँपर सवाल यह खड़ा होता है कि मोहेन्जोदारो, हरप्पा आदि स्थानों पर जो उत्खनन हुआ उसमें वेदकाल से पहले भी यहाँपर जो कुछ इस्तेमाल होता था, उनका पता चलता है। वेदकालीन लोग भी विज्ञान और तंत्रज्ञान के क्षेत्र में काफी माहिर थे इस बात का एक भी सबूत क्यों नहीं मिलता? वास्तुशास्त्र में जिन आठ दिशाओं को महत्व पूर्ण समझा जाता है उनसे हवा की दिशा, सौरउर्जा, गुरुत्वाकर्षण  जैसी बातों से मेल खानेवाले कुछ लोगों का गुट बनता है। इनके आधार पर शुभ-अशुभ को जानना, पैसा और सुखशांति मिलेगी या तकलिफें सहनी पड़ेगी, यश पल्ले पडेगा या अपयशयह सबकुछ तय किया जाता है।   मगर इस बारे में कोई भी वैज्ञानिक निष्कर्ष या सबूत प्राप्त करने की कोशिश वास्तुशास्त्र विशारदों को मंजूर नहीं है।

उपरोक्त सभी कल्पनाएँ ईश्वर, स्वर्ग, नरक, मुक्ति के साथ जोड़ने के कारण लोग उसपर भरोसा करते हैं। उन्हें वैज्ञानिक कसौटियों पर कसने की आवश्यकता नहीं होते। अपनी प्राचीन संस्कृति का गुणगान करते वक्त हमें दुसरी बातों का ध्यान ही नहीं रहता। विज्ञान की कई श्रेणियाँ हैं – आयुर्वेद, गणित, चरकसंहिता, सुश्रुतसेहिंता और वास्तुशास्त्र  ये सभी शाखाएँ प्राचीन काल में ही प्रगतिपथपर थी वे निरर्थक साबित होती गयी। आयुर्वेद की जैसी शाखाएँ केवल जिंदा ही नहीं रही तो अब तक वो तरक्की कर रही है। उसमें अब भी संशोधन जारी है। वास्तुशास्त्र तो 20 साल तक लोगों को मालूम ही नहीं था। इसका कारण स्पष्ट है। कालनाम में लोगों को इस बात का पता चल गया कि शास्त्र का आधार वैज्ञानिक नहीं है। इसलिए यह पुराना सायन्स कालबाह्य हो गया। उसके बाद पिछले कुछ दशकों में इस पुराने सायन्स के लोगों को दुबारा खोजबीन करनी पड़ी और आधुनिक विज्ञान की चौखट में उसे फिट करना पड़ा।

दिशाओं का प्रभाव –

वास्तुशास्त्र में दिशाओं का प्रभाव काबहुत महत्व होता है। अत:  हवामान के परिणामों का अदांजा ले सकते है। फिर उसका ठीक से इस्तेमाल कर सकते है। मगर आज हम जिस वास्तुशास्त्र के बारे में बेहस करते हैं, उसमें व्यावहारिक उपयोग का विचार न करते हुए लोगों के मन पर जबाव महसूस हो ऐसी गूढ कल्पना और उसका यदि अनादर करें तो जो कुछ भोगना पड़ता है उसके भयानक परिणामों का भी विचार किया जाता है। वास्तुशास्त्र का मुल ग्रंथ यदि पढ़े तो इस बात की सत्यता महसूस होगी। धरती के चुबंक क्षेत्र का और आदमी के भविष्य पर होनेवाले उसके परिणाम का जिक्र चक उसमें नहीं करते। वैसे आम तौर पर वास्तुशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने से कौनसे बुरे परिणाम होंगे यह बात सीधे सादे शब्दों में बतलाई जाती है। आये दिन वास्तुशास्त्र में बच्चों की मौत, दरीद्रता, पूर्ण विनाश जैसी भयानक बातें दर्शायी जाती है। विज्ञान में आदमी की वर्ण या जाति को बिलकुल भी महत्व नहीं होता। वास्तुशास्त्र में तो तत्वों को न मामनेवाले को उसकी जाति या वर्ण के अनुसार भिन्न-भिन्न परिणाम बतलाये गये हैं। ऐसे सायंस को  विज्ञान कैसे कह सकते है ?

वास्तुशास्त्र की भाँति अन्य कई शास्त्र अपनी सच्चाई को साबित करने हेतु वैज्ञानिक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं और लोगों के मन में कई गलतफ़हमियाँ पैदा करते हैं। पढ़ेलिखे बुध्दिमान लोग भी ऐसी वैज्ञानिक संज्ञाओं के शिकार हो जाते हैं। मूल में जिनकी नीवं हो दोषयुक्त और वैज्ञानिक हो उस वास्तुशास्त्र की खामियों की और वे ध्यान नहीं देते। इस भ्रामक शास्त्रों का आधार है आठ दिशाएँ। ये आठ दिशाएँ नॅचरल नहीं होती। उन्हें अपनी सुविधानुसार लोग ही तय करते हैं। हमारा पूर्व दिशा का प्रदेश ब्रम्हदेश के पश्चिम में होता है। ऐसी अनिश्चित दिशाएँ शुभ या अशुभ, अच्छा या बुरा परिणाम कैसे दिखला सकती है ? पृथ्वी तो हमेशा अपने ही इर्दगिर्द पश्चिम से पूर्व की ओर घूमते रहती है। किसी प्रचंड पहिए पर बैठकर हम लोग घूमते हैं वैसे। वह पहिया घूमते रहने पर हमें अपने आसपास की सभी वस्तुएँ घूमती हुई नजर आती है। प्रत्यक्ष में हम ही घूम रहे होते हैं और आसपास की सभी चीजें स्थिर होती है। ऐसे ही सूर्य  भी हमें पूर्व दिशा की ओर उगा हुआ दिखता है और दिनभर का सफर करके शाम को पश्चिम में अस्त होता हुआ दिखता है। ऐसी स्थिति में दिशाओं को शुभाशुभ, लाभदायक या धोकादायक जैसे विश्लेषण लगाने में कहाँ की समझदारी है? इससे भी मजेदार स्थिति आर्क्टिक एवं अटांर्टिक प्रदेशों में पायी जाती है। इन प्रदेशों में 6 महिने का दिन और 6 महिने की रात होती है। 21 मार्च से 23 सितंबर की कालावधि में आधी रात में आसमान में सूरज दिखाई देता है। फिर यहाँपर आप वास्तुशास्त्र के महान तत्व कैसे लगा पायेंगे?

वास्तु का रहस्य –

वास्तु याने क्या ? इसका सही अर्थ क्या है? संस्कृत भाषा में इस शब्द का अर्थ है – हम रहते हैं वह स्थान याने वास्तू! वास्तुशास्त्र का जब जन्म हुआ था तब नगर-पालिकाएँ नही थी। शहर विकास अधिकारी भी नहीं थे और मकान बनाने का कानून भी नहीं थे। वास्तुशास्त्र के अनुसार रसोईघर वातविमुख दिशामें होना चाहिए और यह बात ठिक भी है क्योंकि रसोईघर में पैदा होनेवाला धुंआ घर में फैलने के स्थानपर हवा के साथ बाहर फेंका जाय। पहले घर में हवा को बाहर फेंकने वाले पंखे नहीं थे। मगर आये दिन ये सुविधाएँ होने के कारण वास्तुपंडित प्राचीन बातों का मजाक उडाते हैं। कारखानों में बॉयलर रुम कहाँ होनी चाहिए इसके बारे में वे सलाह देते हैं क्योंकि रसोईघर में जैसे अग्नि होता है वैसे ही  बॉयलर रुम भी होता है। भारत फोर्ज कंपनी ने बहुत सी पूंजी खर्च करके अपने फ्लॅट की रचना वास्तुशास्त्र के कथनानुसार बदली। ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं। मगर वास्तुशास्त्र में एकाध श्लोक में भी बॉयलर और फॅक्टरी का विवेचन नहीं मिलता। तब उनका अस्तित्व था ही नहीं। अब स्थिति बदल चुकी हैं। धुआं नहीं होगा ऐसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। फिर हम वास्तुशास्त्र के इन तत्वोंपर कब सक काम करेंगे?

वास्तुशास्त्र के अनुसार किसी भी बिल्डिंग का प्रवेशद्वार दक्षिण की ओर होना अशुभ माना जाता है और ऐसा होगा तो विनाश अटला है। किसी बाजारपेठ में रास्ते को दोनों ओर जहाँ दुकान लगे होते हैं वहाँपर आधी दुकानों का प्रवेश दक्षिण दिशा से ही होगा। वे सबके सब दुकानदार असफल होते हैं क्या? वॉशिंग्टन, डी.सी. के व्हाईट हाऊस का प्रवेशद्वार दक्षिण दिशा की ओर है।  वास्तुनियमों से बिलकुल विरोध में। पर वहाँ रहते है अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष संसार की प्रबल महासत्ता के प्रमुख।

वास्तुशास्त्र के काल में घर के दरवाजे और खिडकियाँ हवा खेलने के लिए सीधी लकीर में होना जरुरी समझा जाता था एक किताब में कहा गया था कि पश्चिम दिशा की तरफ छाया दनेवाले बड़ेबड़े पेड़ होने चाहिए। उस विभाग की कड़ी धूप को रोकने के लिए इनकी आवश्यकता है। पर उत्तर भारत में इसकी जरुरत नहीं होती। द। भारत में सूरज की रोशनी उत्तर की तरफ से आती है। इसलिएँ यहाँ पर यह नियम लागू होता है। वास्तुशास्त्र के सभी ग्रंथ उस इलाके की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखे गए है। मगर आये दिन उन को दिल्ली से कन्याकुमारी तक भी स्थानों पर लागू किया जाता है। एक वास्तुशास्त्र में तो ऐसा कहा गया है कि ब्राम्हणों को घर होने ही नहीं चाहिए। उस काल के हिसाब मे यह बात ठीक होगी भी। पर अब भी हम अंधे बनकर उसे अपनाए क्या ?

आजकल वास्तुशास्त्र के द्वारा जो बात स्पष्ट नहीं की जाती क्योंकि सेंकड़ों साल पहले वास्तुशास्त्र के कई वास्तुशास्त्र रुप थे। उनके लेखक भी कई थे – वराहमिहीर, भृमु,मनुसार, मयमत वगैरा। हर एक का अलग ग्रंथ, स्वतंत्र स्पष्टिकरण और खुद के प्रांत की आबोहवा, सामाजिक नियम, उपलब्ध साहित्य इन सबका विचार करके बनाये गए मकान एक जैसे होना असंभव है। हर एक ने अपने सुविधा के अनुसार नियम बनाये थे।

पानी पश्चिम दिशा की ओर रखा हो तो  वास्तुशास्त्र के अनुसार दुर्भाग्य का कारण होता है। मुबंई में तो अरबी समुद्र पश्चिम दिशा की ओर है और मुबंई तो हमारे देश का प्रमुख व्यापारी शहर है। वहाँ कितनी बड़ी आर्थिक बातें दिनरात चलते रहती है। फिर कैसा आया दुर्भाग्य ? आजकल के वास्तुपंडित कहते हैं कि  मुबंई में शहर को समुद्र में मिट्टी भरकर बनायी गयी जमीन पर बसाया गया है इसलिए वास्तुशास्त्र के नियम वहाँ पर लागू नहीं होते। मगर पूरा मुबंई शहर ऐसी जमीन पर नहीं बसा है। फिर इस सवाल का क्या जवाब होगा ?

अपने यहाँ का इतिहास देखना होगा। हमारे मराठी शासक पेशवेजी ने सुखसमृध्दि प्राप्त हो इसके लिए उत्तर दिशा की ओर मुख हो ऐसे दरवाजे बनवाए। पुना का शनिवारवाडा लिजिए। उसका बड़ा सा प्रवेशद्वार उत्तर दिशा की ओर है। फिर भी वे मुसीबतों से हैरान हो गए थे। कर्ज के बोझ से लद गए थे।

वास्तुशास्त्र की एक किताब में लिखा है कि पूर्व दिशा की ओर से बहनेवाली नदियाँ ही उस प्रदेश को सुजलां सुफलां बना सकती है। उस जमानें में कुछ खास इलाकों में ऐसा हो गया होगा मगर यह संसारभर का नियम नहीं हो सकता। भारत में गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, केरल इन राज्यों में पूर्व दिशा की ओर बहनेवाली नदियाँ है ही नहीं। परंतु इन राज्यो में समुध्दि नहीं है ऐसा नहीं कह सकते। तिरूपति का मंदिर वहाँ की वास्तू के कारण बहुत धनवान है। अन्य मंदिर उनकी वास्तु की वजह से गरीब हैं। भगवान भी इस वास्तू के लफड़े से छूट नहीं पाते।

और एक सवाल पैदा होता है। वास्तु के प्रति इतना प्यार अभी क्यो उमड़कर आया है। यह सवाल सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरुप का है। उसके चार कारण हो सकते हैं।  वे हैं – अपनी असफलताओं का कारण वास्तू को बताना। कई लोग रातभर में अमीर हो जाते हैं। फिर वे किसी वास्तुपंडित को पापविमोचन करने हेतु, प्राप्त धन से भगवान को भी हिस्सा लेने के लिए बुला लेते हैं। भगवान भी बहुत जल्द उनकी पुकार सुन लेते हैं। ऐसी अंधश्रध्दाएँ कभी  कभी बीमारियों की तरह फैल जाती हैं।एखाद मंत्री ऐसी ही कुछ बातों के लिए वास्तुशास्त्रज्ञ से मिलता है और फिर उसके पीछे अन्य लोग भी उसी राह से लगते हैं।

इन सारी बातों का दुष्परिणाम मकान बनाने वाले बेपारियों को भुगतने पड़ते हैं।  आधुनिक वास्तुतज्ञ अलग-अलग 50 विषयों का पांच साल तक भरसक अध्ययन करते हैं इतना परिश्रम करने के बाद प्राप्त ज्ञान को कुछ लोग क्षणभर में फालतू करार देते हैं। उसमें से कई लोगों को कॉलम, लिटेंल, बीम इनके बीच का फर्क भी मालूम नहीं होता। फिर भी पूरा निर्माण कार्य और पूरे शहर की रचना के बारे में वे सलाह देते रहते हैं। लोग भी उनकी बातें मानते हैं। मेरे यहाँ कई आर्किटेक्ट विद्यार्थी निराश होकर आते हैं और अपने वास्तुशास्त्री के बारें में शिकायत करते हैं। मकान का निर्माण का परफेक्ट नक्शा बनाने के बाद हमारे ग्राहक किसी वास्तुविद को ले आते हैं। यह ज्ञानी हमें कई सुधार सुझाता है जो मकान को विद्रूप बना दैते है और ऐसे सुधार करना उस ग्राहक के हित में नहीं होते।

किसी वास्तुविद ने देवेगौडाजी से कहा “आपके घर में प्रवेश करने हेतु दो सीढियाँ है इसलिए आप पूरे पाँच साल तक शासन नहीं कर पायेंगे।  आर्किटेक्ट ने एक आयडिया की।  प्रवेशद्वार के पास एक गढ्ढा खोदा और वहाँ एक फर्श बिठाकर नाममात्र की क सिढी बनायी। तीन सिढ़ीयाँ हो जाने से अब सभी खुश हो गए। मगर इस तिसरी सीढ़ी को भी देवेगौड़ाजी को पाँच साल तक टिका पाना संभव नहीं रहा।

एन. टी. रामारावजी को सलाह दी गई थी कि उनके सेक्रेटरिएट की उत्तर दिशा में कुछ मीटर का एक खुला पॅसेज होना चाहिए। वहाँ पर बहुत सा धन खर्च करके वहाँ की  झोपडियाँ हटाई गई और रामारावजी के लिए उत्तर दिशा में बड़ासा प्रवेशद्वार बना। गया। मगर दुर्भाग्य से जल्द ही उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाया गया और साक महीनों के बाद ही वे स्वर्गवासी हो गए। वास्तुशास्त्र के अनुसार परिर्वतन करने के लिए जनता के करोड़ो रुपये मंत्री गण अपनी इच्छाके अनुसार खर्च करते रहते है। उनके विरोध में न्यायलय में जनहितयाचिका पेश करनी चाहिए।दुःख की बात यह है कि इन वास्तुशास्त्र विदों पर किसी तरह की बंदी नहीं और कोई भी कानून उनपर लागू नहीं होता। उनके ये सभी कार्य ग्राहक सुरक्षा कानू  के अंतर्गत लाने चाहिए। समाचारपत्र, टिव्ही और अन्य मिडियावालों को सजग रहकर उनकी प्रशंसा करना बंद करना चाहिए। वास्तुशास्त्र के मूल ग्रंथ में कहा गया है कि भोंदू लोगों के द्वारा ऐसा व्यवसाय किया जाय तो उन्हें कड़ी सजा देनी चाहिए। इस मामलें में व्स्तुपंडितों का क्या कहना है ?

ख्रिस्टोफर रेन ने एक चर्च बनवाया। उसके भीतर एक भी खंबा नहीं था। वह चर्च ढह जाएगा ऐसा भय सबको हो रहा था मगर ख्रिस्टोफर ने दावे के साथ कहा कि वह एकदम पक्का बना है और सौ साल तक जरुर टिकेगा। लोगों का भय खत्म करने हेतु अंत में उसने एक खंबा भीतार खड़ा किया। मगर यह खंबा छत तक पहुँच ही नहीं सका छह इंच जानबूझकर छत के नीचे रखा था। इस खंबे से छत को नहीं मगर लोगों की मानसिकता को सहार मिल रहा था।

“और एक दुर्भाग्य की बात यह है कि आये दिन ख्रिश्चन और मुस्लीम लोग भी वास्तुशास्त्र के भंवरे में फंस चुके है।  इस लहर के विरोध में लड़ रहा हूँ।  मुझे अब स्वयं-सेवकों की मदद चाहिए।  इस संदर्भ में मेडिकल रेमेडीज एक्ट 1910  वास्तुशास्त्र के व्यवसाय लिए बन जाना चाहिए। वास्तुशास्त्र के जानकार लोगों ने अपना मत लिखित रूप में सूचित करना चाहिए।  इस विषय की अंधश्रध्दाओं पर रोकथाम लगाने के लिए महाराष्ट्र अंधश्रध्दा निर्मूलन समिति के जैसी समितियाँ बननी चाहिए ”

आर. व्ही. कोल्हटकर

डेक्कन हेरॉल्ड से साभार

मकान बनाने के लिए कुछ आश्चर्यजनक सूचनाएँ —

स्नानगृह पूर्व दिशा में होना चाहिए और हिटर स्विच बोर्ड अग्नेय दिशा की ओर। ऐसा क्यों ? क्योंकि अग्नेय यानि अग्नि। अत:  जो जो गर्मी देता है वो अग्नेय में हो।

आपका प्लॉट यदि अंग्रेजी एल आकारवाला हो तो आपको केवल लड़कियाँ होंगी। ये कैसे संभव है ? सवाल आसान है। इस विशेष आकारवाले प्लॉट में शुक्राणु केवल स्त्री गर्भ की ही पैदाईश कर सकते हैं। प्लॉट का मुख्य द्वार यदि पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होगा तो मकानमालिक को धनलाभ होगा, समृध्दि बनी रहेगी। मगर बच्चे भी ज्यादा होंगे। ऑपरेशन कर लिया होगा तो भी बच्चे पैदा होंगे।

रसोई का प्लॅटफॉर्म पूर्व या अग्नेय के बजाय अन्य किसी दिशा में होगा तो घर की स्त्री को सरर्दर्द, कमरदर्द और ब्लीड़िग की शिकायत होगी।

शौचालय पश्चिम में होना चाहिए। क्योंकि अंग्रेजी वेस्ट याने पश्चिम। वेस्ट का मतलब होता है – निरुपयोगी, फालतू। ऑपरेशन करते समय डॉ। का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। शरीर के किसी भी हिस्से की शस्त्रक्रिया होगी तब भी। ये सभी सूचनाएँ और उनके कारण वास्तुशास्त्र के पंडितों ने दिये हैं। और ये सारी बातें विज्ञान के द्वारा सिध्द की गयी है ऐसा उनका दावा है।

ऐसी विचित्र सूचनाएँ क्योकर दी जाती है ? आपही के निरोग, संपन्न, एवं सुखी जीवन के लिए। आज ये सूचनाएँ विचित्र लगती है। कुछ दशकोंपूर्व ये अंसभंव-सी लगती थी लेकीन आज आदमी ने सफलता पा ली है। कई बाते अब यंत्रो की मदद् से की जा सकती है। हर क्षेत्र में सुविधाएँ बढ़ गई है। प्रगति के कारण आदमी का जीवन सुखी बन गया है। और ईन सारी सुविधाओं का फायदा वास्तुशास्त्री और उनके शिष्यगण थोड़ा ज्यादा ही उठा रहें होंगे। (पृ। 36) वास्तुशास्त्रयों का जावन इसी वजह से ज्यादा संपन्न और ऐशो आराम से गुजरता होगा।

वास्तव में, वास्तुशास्त्र के भीतर ही कुछ बेमतलब की और फालतू बातें है। उनका स्पष्टीकरण देना और उनके उपयुक्तता के बारे में विवेचन करना आसान नहीं हे अत: वास्तु पंडितों में ही मतभेद होते हैं। आधुनिक आर्किटेक्चर के साथ उसकी तुलना नहीं हो सकती।

उपयुक्तता, सुरक्षा, आरोग्य, मजबूती, सुदंरता और खर्च इन सभी बातों का आधुनिक आर्किटेक्चर में गहराई से विचार किया जाता है। इसके बजाय वास्तुशास्त्र तो पूही तरह से परंपरागत श्रुती-स्मृति –पुराणोक्त बातों पर ही निर्भर रहता है। इसी के आधार पर किसी वास्तु में रहनेवाले का भविष्य वास्तुशास्त्री कथन करते हैं।

आधुनिक आर्किटेक्चर और प्राचीन वास्तुशास्त्र इनकी धारणाओं में बहुत फर्क है। आर्किटेक्चर बच्चों के लिए अच्छा गोदा रक वह तुम्हारी जननक्षमता को बढा या घटा नहीं सकता। वास्तुशास्त्र की तरह भौतिकता से बाहर जाकर देव-दानव, शत्रू आदि की पीड़ाओं पर नियंत्रण नहीं रख सकता। आये दिन वास्तुशास्त्र जाननेवाले अपने शास्त्र को वैज्ञानिक कहकर पेश करने की कोशिश करते हैं। आपका नसीब नहीं बदला जाता ऐसी मान्यता हैं। अत: वास्तुशास्त्र में विरोधाभास नज़र आता है अंगुठी या रत्न को चुनना तथा वास्तुशास्त्र का स्वीकार करना इससे नसीब बदलता है या नहीं यह बात कैसे तय करें ? नसीब बदला तो शास्त्र सच्चा और नसीब ना बदले तो शास्त्र झूठा या और कोई कारण बतलाया जाता है। वास्तव में शास्त्र या साइंस कभी भी झूठा साबित नहीं किया जा सकता। अलावा इसके वास्तु-शास्त्र तो मंहगा होता है और वह केवल अमीर लोगों को ही रास आता है।

वास्तुशास्त्र के पंडित कई खर्चीली, अवैज्ञानिक, फालतू और कभी कभी घातक सूचनाएँ करते रहते हैं। कभी कभी तो बनाबनाया पूरा मकान गिराकर वास्तुशास्त्र के अनुसार नये ढंग से बनाया जाता है। इस प्रकार समय, साधन, मेहनत, धन को बेकार में खर्च करना गुनाह होता है।

अपने यहाँ की दरिद्रता खतम करने के लिए वास्तुशास्त्र को अपनाना एक लाभदायक उपाय साबित हो सकता है। अपने यहाँ की गरीब जनता को माकान के रुप में एकाध कमरा दिया जाता है। उन्हें उसी कमरे में वास्तुशास्त्रवाले जहाँ कहेंगे वहाँ रसोईघर, शयनगृह, आदि की जगह तय करनी पडती है। उतना सामान हिला दिया की काम खतम। उनका प्रवेश यदि उत्तर की ओर से होता हो तो सोने में सुहागा ?

वास्तुशास्त्र के अनुसार इस सदी में प्रवेश उत्तर या पूर्व की ओर से करना चाहिए। आप जितने पैसे गिनोगें उतनी सेवा वास्तुशास्त्री आपको देते हैं। पर उनकी सेवा कितनी मिलेगी कह नहीं सकते। आप ठगे जाते हो और आपका आर्थिक नुकसान भी हो सकता है। ये बातें जानते हुए भी आप अपने मन को दैववादी बनाते हो।

वास्तुशास्त्र के प्रचीन ग्रंथ समरांगणसूत्र में धरतीपर पहली वास्तू का निर्माण कैसे हुआ इस संदर्भ में एक खास भारतीय पौराणिक कथा दी गयी है एक बार सभी मानव स्वर्ग में गए। वहाँ पर उन्होंने देवों के साथ और वृक्षों के साथ बहुत मजाक किया हुआ है। इस अनुभव से उन्हें नशा चढ़ गया। अत: देवताओं ने उन्हें पृथ्वीपर धकेल दिया। मगर मानवों ने नीचे गिरते गिरते स्वर्ग का शाली तंडूल नामक पेड़ भी अपने संग पृथ्वीपर लाया। उसको यहाँपर लगाया। इस पेड़ ने इतने सारे फल दिये कि मनुष्यों ने भरपेट खाकर उनको जामा करके भी रख्खा। उस कृत्य से लोभ, मद, संताप, मत्सर, आलस यह षड्-रिपू उफनकर  आये। सभई फल चकनाचूर हो गए और आदमी अशक्त बन गए। उन्हें सुरक्षा की आवश्यकता महसूस होने लगी। अत: उन्होंने स्वर्ग से जो पेड़ लाया था उसीकी टहनियों से एक मकान बनाया। यही तो था आदमी ने बनाया हुआ सबसे पहला मकान। और वास्तुशास्त्र की मूल भी यही था। वास्तुशास्त्र में भृगंराज नामक भगवान को और रुद्र को मनुष्य की बलि चढानेका एक बड़ा महत्वपूर्ण और अनिवार्य कर्मकाडं दिया है। वास्तुशास्त्र के आधुनिक संस्करण्यें में यह प्रथा नहीं होती।

सौभाग्य से आदमीने अपने मकान में निरंतर सुधार करना जारी रख्खा। अलग अलग प्रांत, वहाँ की आबोहवा, संस्कृति, वहाँ आनेवाली आपदाँए जैसी कई बातों का सामना करते हुए संसार के आदमियों ने मकान बनाने की कला में बहुत तरक्की की। भारत के वास्तुशास्त्र के बारे में एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखनी होगी। वह बात हैं सिंधू नदी के इलाके में मूल रहनेवाले नागरिकों पर किया गया आक्रमण और उनकी संस्कृति का विनाश। कई प्राचीन संस्तियाँ इस प्रकार के आक्रमणों के कारण नष्ट हो गई।

उनमें से कुछ गिनीचुनी संस्तियाँ आज भी टिकी हुई हैं। समरांगण वास्तुशास्त्र अनुसार द। भारत में मयमत और उत्तर भारत में विश्वकर्मा प्रकाश ऐसे और दो वास्तुशास्त्र के प्राचीन ग्रंथ उपलब्ध हैं।  और भी कुछ हैं। पर इन सब में मूल तत्वों को लेकर समानता है क्या ? दुर्भाग्य से किसी भी तत्व को लेकर उनमें समानता नहीं है। दिशाओं के परिणाम, देवदेवताओं के स्थान जैसी महत्वपूर्ण बातों पर भी उनके मतभेद पाय़े जाते हैं। धर्म, जात, राष्ट्र आदि के बारें में पसंद/नापंसद, गलतफहमियाँ, पूर्वग्रह जैसी बातें विज्ञान को मजूंर नहीं है।

मयमत वास्तुशास्त्र द. भारत के केरल प्रांत में रचा गया था। यह प्रदेश दक्षिण और पश्चिम में समुद्र से घिरा हुआ है। ऐसी स्थिती में मयामत के लेखक को प्रांत की प्रगति पूर्व या उत्तर दिशा में ही हो सकती है ऐसा लगना स्वाभाविक है। इसके विपरीत उत्तर भारत में विश्वकर्मा उस इलाके के उत्तर और पूर्व की ओर हिमालय उंचे उंचे पहाड़ों की कतारों से घिरा होने के कारण प्रगति पश्चिम और दक्षिण दिशा में हीहो सकती है ऐसा मानते थे।

मयमत के लेखक महोदय ने उस प्रदेश का मौसम पश्चिम दिशा तय करती है ऐसा समझकर लोगों को यमदेवता की पूजा करने के लिए कहा था। तो ऐसा था प्राचीन काल की अप्रगत अवस्था में स्थित वास्तुशास्त्र का प्रारंभ। समय की धारा में यह शास्त्र लोग भुला चुके थे।

आधुनिक युग में इस शास्त्र का पुनरुत्थान हुआ है। आज भी लोगों के मन में इस शास्त्र को लेकर पूरा समाधान नहीं है। यह शास्त्र पूरी तरह से विज्ञान ही है ऐसा जताने के लिए इसमें अनेक वैज्ञानिक संज्ञाओं का इस्तेमाल करके लोगों को उल्लू बनाया जाता है। व्ही। गणपती कहते हैं कि वास्तुशास्त्र में व्ही। आर। एफ तत्व प्रयोग में लाया जात है। (व्ही – व्हायब्रेशन, आर – र्हिदम याने लया और एफ –  फॉर्म  याने आकार) विश्व बहुत व्यापक है। उसमें नाद और कंपन पैदा होते हैं अत: उसे गोल आकार मिला है। मानव और विश्व के अद्वैत का यही तत्व है। इसमें बहुत कुछ रहस्य भरा हुआ है जिसे समझ पाना मुश्किल है। पढ़े लिखे आदमी भी भूलभुलेया में फंस जाते हैं और त्रूटियों की ओर नजरंदाज करते हैं ऐसी ही सदोष नींवपर वास्तुशास्त्र खडा है यह बात वे भूल जाते हैं।

लार्सन अँन्ड टुर्बों जैसी बड़ी बड़ी औद्योगिक कंपनियाँ लिन्हास एन्टरप्रायजेस यह अँडव्हरटायझिंग कंपनी, नोएडा में स्थित झी कंपनी, विक्रम इस्पात, बिर्ला ग्रुप की बिल्डंगे ऐसी कई कंपनियाँ अपनी बिल्डिंगों में वास्तुशास्त्र के अनुसार बड़े बड़े परिवर्तन करके ले रहे हैं। इनमें से कुछ कंपनियाँ यशस्वी साबित हुई तो कुछ असफल। इस भोंदू शास्त्र पर भरोसा करके बैठना गलत है। वास्तव में विवेकपूर्ण विचार करने के बजाय उसे हमारी प्राचीन संस्कृति की धरोहर या हमारी कई पीढ़ीयों की पूंजी आदि संबोधननें से उसका महत्व बढ़ाया जाता है।