पशु बलि

धार्मिक यात्राएँ – महाराष्ट्र में गर्मी के दिनों में सभी देहातों में किसी न किसी भगवान की जत्रा भरती है। ये जत्राये ज्यादातर मनोरंजन को और गांववालों को एकठ्ठा जमा होने को एक मोका होता है।  ऐसे अवसर पर पशुबलि का कार्यक्रम अत्याधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। पुराणकाल में पशुबलि की प्रथा मनुष्य के जंगलीपन की निशानी थी। इसमें व्यापारियों के आपसी हितसंबध  छिपे होते थे। ये लोग ऐसे उत्सवों को धार्मिक और सास्कृंतिक रुप देकर उसका महत्व बढ़ा देते हैं और इसी माध्यम से अपनी जेब भरना उन्हें आसान लगता था।

हर देहात की अपनी देवता होती है।  उस भगवान की पूजा करने के बाद वह उस गांव की और गांववालों की मुसीबतों से रक्षा करता है ऐसा वे समझते हैं। पीढ़ी दर पीढी चली आ रही इन परंपरोओं को मन से निभायें तो मुसीबतों का सामना नहीं करना पड़ता। इन्हीं में क दुष्ट प्रथा है पशु को बलि चढ़ाने की। जनरली मुर्गी या बकरे का बलि चढ़ाया जाता है मगर कभी कभार एकाध मजबूब रेड़ा भी बलि के लिए काटा जाता है। मांस को एक टुकड़ा भगवान को, कुछ हिस्सा पुजारी को और शेष हिस्से को अपने परिवार और रिश्तेदारों को खिलाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को मन्नत पूरी करना कहते हैं।

सच बात तो यह है कि भगवान को हम कुछ देंगे तो भगवान हमारी रक्षा करेगा ऐसा मानना ही गलत है। स धारणा के कारण गरीब जनता भी फालतू बातों पर खर्च करती है। बलि चढ़ाकर उसका मांस प्रसाद के तौर पर पकाना गलत है। पशुबलि पर लोखो रूपये खर्च करने के बजाय वही पैसा गरीबी हटाने के लिए ओर शिक्षा के लिए खर्च कर सकते है।।

महाराष्ट्र अंनिस के प्रयत्न

पशुबलि प्रथा के विरोध में अंनिस ने प्रचार मुहिम का काम शुरू किया है उसमें कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। उसमें कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। जिनकी रोजी रोटी इसी कामपर चलती है वे लोग इस प्रथा को चालू रखने के पक्ष में होते हैं। इसी कारण स्थानिक गुंडे अंनिस के कार्यकर्ताओं की कोशिशों में बाधक बनते हैं। उनके द्वारा लगाये गये पोस्टर्स फाड डालते हैं।

पशुबलि प्रथा का समाज के लिए आर्थिक या मानसिक दृष्टि से कोई लाभ नहीं होता इसलिए अंनिस ने हमेशा इसका विरोध किया है। कोर्ट ने भी कई बार सार्वजनिक स्थानों पर पशुबलि चढ़ाना बंद कर दें ऐसा आदेश देने के बावजूद भी उसका पालन नहीं होता और पुलिस भी उस हुक्म को अमल में नहीं ला पाते क्योंकि समाज भी सहयोग नहीं देता। इस मामले में अनिंस व्याख्यान देना, पोस्टर्स लगाना, जुलूस निकालना जैसे कारयक्रमों के द्वारा लोगों को प्रशिक्षण देते हैं और उन्हें अंधश्रध्दाओं से दूर रखने का प्रयत्न करते रहते हैं।