युवाओं के लिए कार्यक्रम

अंनिस का प्रतिबंधक टिका युवाओंको लगाना अत्यावश्यक

अंनिस जैसी संगठना पिछले 20-२५ सालों से निरंतर अंधश्रद्धा के विरुद्ध लढ रही हैI फिर भी लोगों की श्रद्धा तिलमात्र भी कम नहीं हो रही, उलटे ज्यादा फैल रही है इस बात का मुझे बहुत आश्चर्य होता हैI शैक्षणिक संस्थाएँ, शासन, पुलीस, कानून अंनिस को सहयोग देने के लिये दिल से क्यो नही तयार रहतेI बुवाओंके विरोध में कानून बनाने के लिये इतनी देर क्यों लगा रहे हैI 90 % प्रौढ समाज चमत्कारों पर स्थित श्रद्धा और अंधश्रद्धाओं में फसा हुआ हैI इसका सबूत है गणेशजी की मूर्ती को दूध पिलाने के लिये मंत्री गण के साथ सभी सुशिक्षित, अशिक्षित प्रयत्न प्रयत्नशील थेI सत्यसाईबाबा का प्रभाव राष्ट्रपती, कॉंग्रेस की अध्यक्षा, और कई भारतवासियों के मन पर हैI यदि अंनिस जैसा संगठन अंधश्रद्धा की बिमारी के विरोध जनता को विवेक की टिका लगा सकें तो चेचक और पोलिओ के समान अंधश्रद्धा को भी हटा दिया जा सकता हैI  प्रौढ लोगों को यह बीमारी पहले ही हो जाती है और अपने बच्चों पर ये लोग निरर्थक कर्मकांड श्रद्धा और चमत्कारों की सच्ची झूठी कहानीयाँ सुनाकर उन्हे भी  इस बीमारी का शिकार बना देतें हैI कुछ गिनेचुने प्रौढ ऐसे होते है जो शिक्षकों की  सीख से और विवेकवान अभिभावको के कहने से इस बीमारी से अपने आपको बचा सकते हैंI आजके ज्यादातर युवाओं को विवेक की यह टिका ना मिताने के कारण अंधविश्वासू बन गये हैI

अंधश्रद्धा की बिमारी से परेशान प्रौढों को रोगमुक्त करना असंभव हैI ये लोग 40 -45 सालों तक यह बीमारी फैलाते रहेंगे और अंनिस जैसी संगठना कोई इलाज कर नही सकतीI उनकी पारंपरिक श्रद्धाएँ और कर्मकांडों की थोडी भी पूछताछ करें तो वे लोग चिड जाते हैंI अपने बच्चों अंनिस के कार्यकर्ताओं से बचाते हैंI अतः इन प्रौढ लोगों के बीच प्रचार करते समय अंनिस को बहुत संभलकर काम करना पडता हैI

यह बात सच है कि अंधश्रद्धा के साथ साथ किसी भी बिमारी को हटाना बहुत ज्यादा मात्रा में और निरंतर टीकाकरण करना ही पडता हैI मगर आज की परिस्थिति में अंनिस और अन्य समविचारी संगठनों के लिये यह बात मुष्किल हैI दूषित वातावरण में अंनिस की कोशिशें जरासा गंगाजल छिडक देने जैसी बात हैI इससे बात बन नहीं सकतीI कोशिशें कम पडती हैI

पिछले बीस सालो में अमनिस के द्वारा किये गये प्रयत्न और जमा की हुई साधनसंपत्ति कार्यकर्तागण, शैक्षिक साहित्य, खास रचनापद्धति का निर्माण, विवेकवादी संगठनों और कुछ हद तक सरकाक तथा संस्थाओं का सहयोग आदी बातें परिस्थिति बदलने में अधूरी हैंI अंनिस ने अपनी हद तक क्या कुछ पाया यह हम देखेंगेI

  1. बुवाओं के विरोध में अंनिस ने थोडी सफलता पायी हैI
  2. प्रौढों को अंनिस अंधश्रद्धाओं के बारे में प्रभावित नहीं कर सकी|
  3. आये दिन विवेकवाहिनी और विचारप्रबोधवाहिनी के कार्यक्रमों द्वारा युवा लोगों के मन पर प्रभाव पडने लगा हैI मगर ये केरयकेरम बडे पैमाने पर होने चाहिये और नीचे के तबके तक पहुँचने चाहियेI टीन एज के लडकें और लडकियाँ इनके संपर्क में आये बिना वे अपने घरों और स्कूल – कॉलेजों के अंधश्रद्ध वातावरण के साथ मुकाबला नहीं कर पायेंगेI

इस बारे में मुझे कुछ सूचित करना है,

  1. बुवाओं के विरोधमें मुहिम जादा प्रभावी ढंग से जारी रखना चाहियेI
  2. अंधश्रद्धा और अंधविश्वास रखनेवाले अभिभावकों को ध्यान को केंद्रित करने की बजाय युवा बच्चों को उनकी विचारधारा बदलने के लिये कार्य  करेI अंनिस के कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे अपनी लेखन कुशलता बढायें और अपनी बातें लोगों को समझाने की कला में निपुणता प्राप्त करेंI नई नई किताबें पत्रिकायें पोस्टर्स, ऑडियो – व्हिडियो सीडीज् आदि बनाकर कार्यक्रम के वक्त उनका इस्तेमाल करना न भूलेंI अच्छा भाषण करनेवाले कार्यकर्ता, अध्यापक अंनिस के पास बहुत कम हैं ऐसा कहना पडता हैI रोजमर्रा की जिंदगी में जो अनुभव हम लेते हैं ऐसी बातों मे सवाल जवाब के रूप में लोगों के सामने रख्खेI यह पद्धति ज्यादा प्रभावी होती हैI इन्फर्मेशन टेक्नॉलॉजी के साधन और प्रसारमाध्यमों का बडे पैमाने पर इस्तेमाल कर के लोगों तक अपनी बातें पहुँचाने का प्रयास करना चाहियेI
  3. सरकारी दफ्तर से संपर्क और स्कूल, कॉलेजों में अंनिस को कार्यक्रम करने की मंजूरी मिलने के लिये चक्कर काटते रहोI इससे अपने कार्यक्रम के वक्त ये लोग बाधक नही बनेंगेI

प्रबोधन की कोशिशें

अंनिस के प्रबोधन की कोशिशोंकी बाते अपने यहाँ के प्रौढों को सुनने मिलती हैI महाराष्ट्र में 4-5 करोड लोग अंधश्रद्धालू और चमत्कारों पर विश्वास रखनेवाले हैI विवेकवादी लोग बहुत कम मिलते हैंI यह सब ऐसा ही रहा तो अपना समाज विवेकवान होना असंभव होगाI  इसिलिये युवा वर्ग विवेकवादी की ओर कैसे मूडेंगे इस बात की तरफ ध्यान देना चाहिएI प्रगतीशील विचार किशोरावस्था से ही उन तक पहुँचने चाहियेI 10 साल तक वे पढते रहते हैं और इसी समय विवेकवाद उनमें समा जाना चाहिए और चमत्कार, दैववाद,रूढियाँ इन सब वे परे हटने चाहिएI

अर्थात  ऐसा परिवर्तन धीमी गति से ही होगाI (यह प्रयत्न ज्यादा सफल होने हेतु इस लेख में कई उपाय सुझाए गए हैं उनमें से कुछ नीचे दिये हैंI

  1. थोडे खर्च में जिस इलाके में ज्यादा परिणाम दिकाई देते हैं ऐसे िलाके निश्चित कर के उनपर ज्यादा जोर देना चाहिएI शहरीकरण की वजह से बहुत बडा जनसमुदाय छोटे छोटे शहरों में इकठ्ठा हो रहा हैI एसा इलाकों में विद्यार्थीयोंकी संख्या भी बडी होती हैI थोडे खर्चे और क्रम समय में ज्यादा विद्यार्थिंयो तक पहुँच सकते हैंI यहाँ पर ही स्कूलें में जानेवाली लडकियोंको प्राथमिकता दी जानी चाहिएI
  2. कुछ गिनेजुने समर्पित कार्यकर्ता, तज्ञ, और सलाहकार मिलकर संगठन के कार्य का प्रचार करनेवाले पत्रक, संपर्क के साधन आदि बनवा लेंI
  3. हाथ में लिये ह्ए कार्य के लिये कितना समय, पैसा खर्च और प्रयत्न खर्च हुए उससे हासिल क्या हुआ इसका हिसाब रखना चाहिएI

वसंत दिवेकर