ज्योतिष

फलज्योतिष

फलज्योतिष पर भरोसा करनेवाले लोगों को ज्योतिष शास्त्र का निर्माण कैसा हुआ और उसके आधार पर कही जानेवाली बातें वाकई सत्य होती है क्या इस बारे में कोई जानकारी नहीं होती l उनके बारे में और उनके कुछ दोस्तों के बारे में कही कुछ बातें सच होने का अनुभव उन्हें आता है और उसी बलबूते पर ने ज्योतिष पर भरोसा करते हैं l पुरानी रूढी और मान्यताओं पर आँख मूँद कर भरोसा करने की वृत्ति यह भी एक और कारण होता हैl पर आश्चर्य तो तब होता है जब ज्योतिषियों द्वारा कही हुई बातें पूरी तरह से झूठी साबित होने पर वे उन्हें भूला देते हैl गलत बातों का समर्थन कई ढंग से किया जाता है।

इस क्षेत्र में इस शास्त्र का संपुर्ण ज्ञानवाले ज्योतिषी बहुत ही कम होते हैं l सामान्य ज्यातिषि तो बडी सहजता के साथ गलतियाँ करते रहते हैं। ज्योतिषियों दिया हुआ जन्म समय बिलकूल सही होता है ऐसा नहीं होता इस वजह से भी कई अंदाज गलत होते है l यह ज्योतिष शास्त्र की गलती नहीं है l ऐसे कोई कारण दिये जाते है। ज्योतिष लोगों की बातें जिनपर टिकी होती है, उन्हें कोई हटा नहीं सकताl अत: उनकी कही बातों की छानबीन करना मुश्किल हो जाता हैl

मानने योग्य बातें – शगुन – अपशगुन

जमीन के नीचे खनिज या पानी है कि नहीं इसे पहचानना, अदभूत शक्ति का अस्तित्व मानना यह मनुष्य के मन की कमजोरी होती है l फल ज्योतिषी याने पंतग उडाने जैसा काम है lउसमें जो तत्व हैं वे सब बचकाने हैं l व्यक्ति का स्वभाव, गुणदोष और दैव उसके जन्म के समय सूर्यमाला में ग्रहों के राशिचक्र के स्थान आंके जाते हैं l ग्रहों में सुर्य, चंद्र इन सितारों का और उपग्रहों का समावेश होता हैं l इन सबका स्थान कुंडली में बताया जाता हैं l इसपर से उस व्यक्ति का भविष्य कथन किया जाता हैं l व्यक्ति का जीवन कैसे होगा, कौनसी मुसीबतें आ सकती हैं, भविष्य में क्या कुछ हो सकता हैं यह कहकर उचित निर्णय लेने के लिए वे मदद करते हैं l यह ग्रह,  तारे, नक्षत्र अपने से कितनी दूरी पर है और उनका हमपर कोई परिणाम करना बिलकुल असंभव है यह बात कुछ लोग जानते है, परंतु संसार के अन्य लाखों, करोडों लोग अपनी सेहत के बारे में, व्यवसाय के संर्दभ में अथवा व्यक्तिगत निर्णय फलज्योतिषी या मिडिया के जरिए प्राप्त राशिभविष्य को पढकर लेते हैं l मनुष्य जीवन की अनिश्चितता यह अंधविश्वास एक कारण हैं l संख्या शास्त्र और विज्ञान की कसौटीपर फलज्योतिष टिक ही नहीं सकता l कुडंली के द्वारा भविष्य जानने के लिए जो पध्दति इस्तेमाल की जाती है उसको देखकर तो विवेक को न पटनेवाली बातें पहले से मान ली जाती हैं l गलत विज्ञान के सहारे फलज्योतिषी उनका समर्थन करता हैं l

१) सभी शहरों में किरणोत्सर्ग होते रहते हैं l ये किरण धरती पर सभी स्थानोंपर एक साथ पहुँचते हैं l जहाँ आवश्यक है वहाँ पर ये किरणे पृथ्वी के घन द्रव्य में से उस पार जाती हैं और राहू और केतु तो काल्पनिक बिंदू हैं उनके भीतर से भी ग्रहों के जैसाही किरणोत्सर्ग होता हैं l

२) पृथ्वी पर पहुँचने से पहले उन किरणों का दस गुटों में पृथ:करण होता हैं l प्रत्येक गुट कुंडली के अलग-अलग घर में अलग-अलग फल देता हैं l

३) ग्रहों की कई दृष्टीयाँ होती हैं l कुडंली के विशिष्ट ग्रह पर उनकी विशिष्ट दृष्टी होती हैं l इस पर से आदमी का भविष्य तय होता हैं l ये सभी काम करने के लिए ग्रहों को फलज्योतिष के नियमों का ज्ञान और दैवी शक्ती दोनों होते हैं l

भविष्य कहने के लिए फलज्योतिषियों को दैवी अनुग्रह होना जरुरी हैं l इसके लिए वैज्ञानिक जिज्ञासा को परे हटा देते हैं l वे जितने सही भविष्य कहते है उतने या  उससे ज्यादा झुठे भविष्य होते हैं l इसलिए साधारण तौर पर विचार करनेवाले लोगों को फलज्योतिष बकवास ही लगता हैं l

2.फलज्योतिष को अनिस का विरोध-

पहली बात तो यह है कि वैज्ञानिक मनोवृत्ति रखना यह हर भारतीय नागरिक का फर्ज है| फलज्योतिष संविधान के ईस दिशादर्शक तत्व को ही नहीं मानता क्योंकी फलज्योतिष हमें फिर से गुफा में रहनेवाले आदिवासी की अवस्था तक पहुँचानेवाला अंधश्रध्दाओं का बोझ हैं। हिंदू शास्त्र के अनुसार कुंडली आदमी का भविष्य तय करती हैं l दूसरी बात बहुत अधिक कल्पना करनेवाले वैदिक पंडीत जिनका  अस्तित्व ही नहीं है ऐसे राहू और केतू इन दो ग्रहों को नवग्रहो में शामिल करते हैं l ऐसी कल्पनाएँ मन में संजोकर हिंदू और अहिंदू इनमें दूरी पैदा करने की संविधान विरोधी कारवाई ये पंडीत लोग करते हैं l अध्ययनों के पश्चात ऐसा समझ आया है की फलज्योतिष को जरा सा भी वैज्ञानिक आधार नहीं हैं l भविष्य कहने के लिए जो तकनीक इस्तेमाल की जाती है वे सभी तंत्र भी निराधार हैं l

अंनिस ने तो भविष्यकथन के व्यवसाय को ग्राहक सुरक्षा के कानून के नियंत्रण में रखकर ग्राहकों को झूठा भविष्य कहनेवाले ज्योतिषियों को कोर्ट में ले जाने की सुविधा उपलब्ध करने की मांग की हैं l अपना दावा सिध्द करके  बताइए – ऐसा आवाहन देकर लोगों को मार्गदर्शन और प्रयोग इन तीन प्रकार से अंनिस ज्योतिष का विरोध करती हैं l

3.फलज्योतिषी को आवाहन

फलज्योतिष की मूल संकल्पना और धारणाओं को तथा नके बलबूते पर भविष्यकथन करने के उनके दावों को अंनिस आवाहन करती हैं l कोई भी ज्योतिषी वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरेगा तो अंनिसल उन्हें एक बहुत बडी रकम का पारितोषिक देने के लिए तैयार हैं l यह रकम समय-समय पर बढा दी गई और उसका भरपूर विज्ञापन भी किया ग। किंतु आज तक एक भी ज्योतिषी इस आवाहन को स्वीकार नहीं पाया हैं l इस वजह से लोग फलज्योतिष के बारे में शंका व्यक्त कर रहे हैं l

उद्बोधन

ज्योतिष शास्त्र की मुलभूत संकल्पना और धारणा को दिया हुआ आव्हान सैध्दांतिक स्वरुप का यानि उसमें जो अंतविरोध है उसका पर्दाफाश करने जैसा होता हैं l सामान्य जनता के उदबोधन के लिए बडे बडे ज्योतिषियों द्वारा कही गया बातें बडे पैमाने पर गलत होती है इसका उन्हें अहसास हो और गलती ध्यान में आये ऐसे उदाहरण उनके सामने पेश किए जाते हैं l लोग उसमें से उचित निष्कर्श नुकाल लेते हैं l

प्रयोग

इसके अंतर्गत जन्म के कुछ घंटों बाद ही मृत हो गए बच्चे की पत्रिका एक फलज्योतिषी को दिखाई गई l यह बालक कम उम्रवाला होने की संभावना के बारे में डॉक्टरद्वारा पुछे जाने पर भी उस ज्योतिषी ने यह बालक आरोग्यसंपन्न और दीर्घ आयुवाला है ऐसा भविष्यकथन किया l आम आदमी भी इस घटना से उचित शिक्षा लेगा l

  1. फलज्योतिष के विरोध में आंदोलन

डॉ. अब्राहम कोवूर ने पहली बार इस आंदोलन में फलज्योतिषी की युक्तिसंगत व्याख्या कीl इसमें विवेक वाद मुर्त रूप में लाने का श्रेय उन्हें ही जाता हैंl चमत्कार दिखलाकर  बुवाबजी करनेवाले अलौकिक बाबा और बुवा लोगों को अपने दावे सच करके दिखाएँ ऐसा आव्हान उन्होंने कियाl सन १९७२ में उन्होंने अपना दावा सच करके बतलानेवाले व्यक्ति को एक लाख रूपयों का इनाम भी घोषित कियाl

इसमें सही भविष्यकथन का दावा करनेवाले की कसौटी ऐसी थी – ज्योतिषी को दस व्यक्तियों की हस्तमुद्राएँ अथवा कुंडलियाँ उनके जन्मस्थानों के सही अक्षांश-रेखांश और उनके सही जन्मसमय के साथ दी जायेंगी l ज्योतिषी को सिर्फ दो बातें बतानी होगी

१) जन्मपत्रिका स्त्रि की है या पुरूष की और

२) वह व्यक्ति जिंदा है या नहींl

उस समय किसीने भी इस आव्हान को स्वीकारा नहीं थाl ऐसे ही आव्हान आगे चलकर अंनिस ने और आकर्षक बनाने के लिए एक लाख के बजाय दो लाख तक इनाम की रकम बढा दी और मीडीया के द्वारा बहुत विज्ञापन भी कियाl उनका भविष्य सही होने की शर्त में २०% कम भी की मगर आज तक इतना आसान आव्हान स्वीकार करने कोई सामने नहीं आयाl हाँ लोगों को ज्योतिषशास्त्र कितना बेकार है ये बात समझ में आने लगी हैl

कल का छोडो पर आज क्या है – यह भी पहचान नहीं पाते? भारत के एक भी ज्योतिष पंडित को आज तक किसी का भी सही भविष्य कथन करना नहीं आ सका? पैसों के लिए ना सही कम से कम खुद की इज्जत बनाये रखने के लिए कुछ आसान बातें पहचानने के लिए ज्यादा गहरा ज्ञान नहीं लगताl

5.हस्तसामुद्रिक, फलज्योतिष और रोख बझार विश्लेषकों के विचार

रोखाबझार विश्लेषकः   इस क्षेत्र का भविष्यकथन करना टेढी खीर हैं l कई सालों से में ऐसे भविष्यकथनें का अध्ययन कर रहा हुँ l कुछ सालों मेंने स्वयं कथन किया क्योंकि में इक्विटी रीसर्चर था l शेअर मार्केट के अप-डाऊन्स का कंपनियों के कामकाज सें संदर्भ लगाकर बझार की परिस्थिति का अंदाजा लेता रहा l उस वक्त के लेखों की तरफ आज जब में देखता हुँ तो उसमें मुझे सच्चे झुठें कथनों की एक गुत्थी मुझे नजर आती हैं l मेरे अन्य व्यवसाय बंधुओं के बारें में भी यही चित्र दिखाई देता हैं l सही गलत कुछ भी कहो पर व्यवसाय तो चलते ही रहता हैं l बडी बडी कंपनियो में ऐसे विश्लेषक भरपूर वेतन देकर रखे जातें हैं l निवेश करनेवालोंका इनके कारण बडा नुकसान होता हैं l पर उन्हें कभी कोई हटाता नहीं या उनको कोर्ट में भी खिचा नहीं जाता l उनकी एम। बी। ए। की उपधि का सम्मान करते हुए इन लोगों को हस्तसामुद्रिक या फलज्योतिषी की पंक्ति में बिठाना चाहिए क्योंकि उनमें फर्क सिर्फ इतना ही होता है कि ऐसे विश्लेषकों को बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अच्छा खासा वेतन देती हैं l फलज्योतिषी और हस्तसामुद्रिकों को ऐसा वेतन तहीं मिलता।  पर भविष्यकथन करनेवालों को टीव्ही चोनल और समाचार पत्रों की वजह से खूब नाम मिलता है और कमाई भी ये लोग अच्छी कर लेते हैं l

मैं और मेरी पत्नी – हमारी एक ही राशि है।  हम लोग हर महीने को और पूरे साल का भविष्य बतानेवाला साहीत्य खरेदी करते हैं l वह बारीकी से पढकर उसे मैं अपने पाम पायलटंक में अंकित भी करता था।  याने महीने की पहली तारीख को ही पूरा महिना कैसा बीतनेवाला है – इसकी जानकारी मुझे मिल जाती थी।  दिल्ली में दी जानेवाली सभी पार्टियों में पनीर होगा या नहीं यह जैसे हम दावे के साथ बता सकते है, वैसे ही हमारी राशिभविष्य का विश्लेषण होता हैं l मुझे पूरा भरोसा है कि आपका भी मेरे जैसाही होता होगा।  पूरा भविष्य कथन याने केवल कचरा होता है, निर्रथक होता है ऐसा मैं नहीं कहूँगा पर यह किसी प्रेशर कुकर या रेफ्रिजिरेटर इनके जैसा भरोसेवाला उत्पादन नहीं हैं l भविष्यकथन कोई भरोसा करने जैसी बात नहीं यह हम सब जानते है।  सब कुछ जानते हुए भी ऐसा झूठा उत्पादन मैं क्यों खरिदते रहँता हूँ ?

6.डॉ. नारलीकरजी का मत – आप फल-ज्योतिष को शहरी अंधश्रध्दा कहते हैं l युवक लोग भी उसपर भरोसा रखते हैं इस बात उन्हें चिंता होती हैं l अभी अभी प्रसिध्द हुई उनकी पुस्तक ‘सांयटिफीक एज’ में वैज्ञानिक दृष्टीकोण वाली समाज निर्मिती के संदर्भ में वे कहते हैं – फलज्योतिष पर जो श्रध्दा रखते हैं उसका दुबारा परिक्षण करना जाहिए।  केवलमात्र बुजुर्ग लोग ही इसपर विश्वास रखते बैं ऐसी बात नहीं हैं l बहुत से युवा बच्चों की भी फलज्योतिष पर श्रध्दा होती हैं l मुझे ऐसा लगता है कि हर किसीने व्यक्तिगत तौर पर अपने आपको परखें और उसके बाद ही विवेकपूर्ण निर्णय लें।  डॉ। नरेंद्र दधिच (आयुका के डिरेक्टर) को दिए हुए साक्षात्कार में डॉ। नारलीकरजी ने अपनी इस किताब के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब देते समय पिछली सदी में भारतीय विज्ञान की सफर में आयी हुई बाधाएँ और मिली हुई सफलता का विवेचन किया हैं .

वैज्ञानिक दृष्टीकोण  – मन में घर करने के लिए समाजमन नें परिवर्तन होने की कितनी आवश्यकता है इस बारे में बोलते समय इन्होंने राजा राममोहन राॅय जी ने इस मामले में जो कार्य किया है उसपर प्रकाश डाला।  सतीप्रथा को बंद करा के उसका कानून मंजूर करवाने में राजा राममोहन रॉय  की प्रमुख भूमिका रही है।  शिक्षा के क्षेत्र आधुनिक विज्ञान को लाने के लिए भी उन्होंने पिच्छा पुराया।  समाज का मन बदले बिना सच्ची तरक्की हो नहीं सकती यह बात सवसे पहले उन्हें महसूस हुई।

पुस्तक के अंतिम अध्याय –  ‘विज्ञान और धर्म’ पर पूछे गये सवालों के जवाब देते हुए वे कहते हैं – ये दोंनों स्वतंत्र क्षेत्र हैं और एक की ओर से दूसरे पर अन्याय नहीं होना चाहिए।  धर्म को जैसे वैज्ञानिक तत्वों को अपनाना चाहिए वैसे ही विज्ञान भी अपने को सब बातें समझ जाती है और सबका स्पष्टीकरण भी हम कर सकते हैं ऐसा नहीं – यह बात स्वीकार करें।

उदाहरणार्थ – संसार की उत्पत्ति केसै हुई यह बात आज भी पता नहीं है।  विज्ञान को यह बडा आव्हान है।  अत: विज्ञान को भी नम्र रहना चाहिए।

7.शैक्षिक संस्थाओं में फलजोतिष्य की शिक्षा

शैक्षिक संस्थाओं के द्वारा फलज्योतिष सिखाने की कल्पना बहुत पिछडी हुई है।  सीतारामजी येचुरी यह बात जोर लगाकर कहते है।  हमें हमारी श्रध्दाओं पर भरोसा करना चाहिए इसीलिए हमें फलज्योतिष सिखाना चाहिए ऐसा मुरलीमनोहर जोशी कथन उन्हें याद आया अत:  (बिना सोचे समझे) भरोसा करने से क्या होता है – इस बारे में उन्होंने एक किस्सा सुनाया।  ‘चेन्नई में कुछ मंत्री महोदय पधारे’।   उनका स्वागत हो रहा था।   मंच पर पानी से भरे गिलास रखे थे एक गिलास में रंगीन पानी था।   वह गिलास फ्लाॅवर पाॅट रूप में उस्तेमाल किया जाता था उसमें से पुराने फूलों को हटाकर नये फूल लाने के लिए माली बगीचे में गया हुआथा।   मंत्रीमहोदय को लगा कि हमारे लिए ही यह रंगीन पेय रखा होगा।   उन्होंने वह पानी पी लिया।   अगले तीन दिनों तक उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पडा।  सरकार की ऐतिहासिक बातें भी बदल देना बहुत झंझटभरा काम है।   हिंदू धर्म शुध्द है और उस देश का धर्म हैयह सिध्द करने हेतु भाजप और मित्रपक्षों को आर्य  लोग भी इसी देश के हैं यह बात भी सिध्द करनी पडती है।   फिर मोहेंजोदारो और हडप्पा वाली सभ्यता और संस्कृती भी आर्यो की ही थी यह भी सिध्द करना पडता है आर्य लोगों को लढाई और सफर के लिए घोडे लगते थे।   उनमें से एक आदमी को वहाँ की खोज करते समय घोडे की हड्डी मिली।   याने व पुराने बस्ती आर्यों की थी यह बात भी सिध्द करनी पडी।   मगर उस घोडे की  हड्डी का विश्लेषण करने के बाद पता चला कि यह घोडा केवलमात्र २०० साल पुराना था।

भाजप के द्वारा चुने हुए इतिहास कारों की एक और मुर्खता – खोदकाम करते समय एक बैल के जैसा दिखने वाला जानवर का पुतला मिला।  उसकी आकृति को उन्हों ने कई कम्प्यूटरों में फिड किया।  एक कम्प्यूटर के अनुसार वह घोडे जैसा दिखता है।  याने वह घोडे का ही पुतला।  इसका मतलब आर्य  संस्कृतिका। अब आप ही देखिए।  बैल को घोडा कहते हो और बैल के पुतले के घोडे का पुतला है ऐसा कहते हो तो तुम्हारी धारणा और तुम्हारें सिध्दांतों को क्या समझें ?येचुरी प्राध्यापक थे तब की बात सुनाते हैं l किसी प्राध्यापक ने अपने बगीचे में दस फूट गहरा गढ्ढा खोदा।वहाँ पर उन्हें एक तार का टूकडा मिला।  भागते दौडते वा कॉलेज पहुँचे और बोले, “देखिए, मुझे क्या मिला हैं l इससे पता चलता है कि हमारे पुरखे टेलिफोन इस्तेमाल करते थे।  ” “वाह बहुत खूब। ” ऐसा कहकर दुसरा सहयोगी उसी जगह को और गहरे खोदता हैं l पर उसे कुछ भी नहीं मिला तब वह बोला, देखो, इतना खोदा पर मुझे कुछ नही प्राप्त हुआ।  इसका मतलब इससे भी पहलेवाले हमारे पुरखे और अधिक प्रगतिशील रहें होंगे वायरलेस इस्तेमाल करते थे वो!

हिंदुत्व को कैसे नापना चाहिए इस बारे में येचुरी कहते हैं, आंध्रप्रदेश के कुछ इलाकों में लड़कियों की शादी उनके मामा के साथ करने का रिवाज हैं l उत्तर भारत में इस रिवाज को बहुत बुरा माना जाता है और यदि कोई ऐसी शादी करे तो लोग उन्हें मार ही डालेंगे।

अब यहाँपर सवाल ये पैदा होता है कि इनमें से सच्चा हिंदू कौन ? आंध्रप्रदेश के लोग  या इस रिवाज को गलत माननेवाले उत्तर भारतीय ?हिंदुत्व को नापने के पागलपन का एक और उदाहरण केरल में ओनम का त्योहार मनाया जाता हैं l लोंगों की भलाई करनेवाला राजा महाबली हर साल अपनी प्रजा से मिलने आता है ऐसा वहाँ के लोग मानते हैं l उत्तर भारत में महाबली को दुष्ट राक्षस समझा जाता हैं l उसे मारकर भगवान विष्णू ने सभी देवताओं को छुड़ा दिया।  संसार को बचा लिया।  अब इनमें से सही हिंदू कौन ? रामभ्कतों ने कृष्णभक्तों को कृष्ण भगवान की भक्ति मत करो ऐसा कहना और कृष्णभक्त इससे उलटी बात करें तों ? संक्षेप में भगवान भी किसकी भक्ती करें इसके बारें में कुछ कह नहीं सकते।  नुरीश्वरवाद भी किसी को भी भगवान न मानना-ऐसी एक श्रध्दा ही है और धर्म के बारे में जब भगवान को ही अधिकार नहीं तब इन भाजप वालों को किसने अधिकार प्रदान किया ?पौरोहित्य विषय को महाविद्यालयीन छात्रों की पढ़ाई  में शमिल करना याने छात्रों को सीधे मध्यकाल में ले जाने जैसी बात हुई।  उसमें से निरर्थक, अवैज्ञानिक और फालतू कर्मकाण्ड़ों को फिर से व्यवहार में लाया जाएगा।

सिताराम येचुरी भारतीय कम्युनिस्ट (मारक्स्टि) पार्टी की पॉलिट्ब्युरो के सदस्य हैं।

महाराष्ट्र की अंनिस द्वारा घोषित उपाय –

युजीसी संस्था ने सभी विश्वविद्यालयों में ग्रेज्युएट, पोस्ट- ग्रेज्युएट एवं डॉक्टरेट स्तर के छात्रों की पढ़ाई में फलज्योतिष विषय पढ़ाने के लिए लिखा हैं l इस संदेहजनक शास्त्र को मंजुरी देने की सरकार की नीति को अंनिस ने जोरदार विरोध किया हैं l महाराष्ट्र के विश्वविद्यालयों संपर्क प्रस्थापित करके यह विषय हमें दिशाहीन करने वाला है, प्रगति में बाधक है ऐसा कहकर इसे कुलपतियों ने हमारी बिनती को मान दिया और इस तरह का कोई भी पाठ्यक्रम अपने विश्वविद्यालयों नहीं आने देंगे ऐसा आश्वासन भा दिया।  औरंगाबाद  की अंनिस के कार्यकर्ताओं ने युजीसी में यह पाठ्यक्रम किसी भी संस्था में शुरू नहीं हो पाये ऐसी सूचना देने हेतु कोर्ट के द्वारा केस भी शरीक की हैंl

फलज्योतिष को पढ़ाई का विषय नहीं बनने दें इसके लिए अंनिस ने जगह जगह पर व्याख्यान आयोजित किये।  अपने यहाँ इन्फर्मेशन और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में कोई कुशल कर्मचारी हैं l इनके होते हुए क्यों हम ज्योतिष के पीछे जायें ? फलज्योतिष की प्रशंसा क्यों करे ? फलज्योतिष गूढवाद आध्यात्मिकता और अन्य ढोंगो की भूमि-ऐसी हमारी पहचान विदेशों में हो चुकी हैं l  ऐसी पहचान हटाने के लिए अंनिस फलज्योतिष को माननेवाले लोगों को वादविवाद को बुलाते रहती हैंl   कई – जगहों पर ऐसे वादविवाद हुएँ हैं l  इनके जरिए श्रोताओं को पता चलता है कि फलज्योतिष कितना निरर्थक हैं l

अंनिस ने कहीं कहीं पर इस विषय से संबधित परिचर्चाएँ और संमेलनों को आयोजन भी किया हैं l  उसमे एकमत से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये हैं –

१) महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में फलज्योतिष जैसे विषय पढाये ना जाये।

२) फलज्योतिषपर विश्वास रखने से कई बार हमारा नुकसान होता हैंl  अत: फलज्योतिषीयों को ग्राहक संरक्षण कानून लागू किया जायो।

३) समाचार पत्रों और मासिकों में भविष्यकथन के लेखों के नीचे –  ‘ केवल  मनोरंजन के लिए’  ऐसी टिप्पणी छापना अनिवार्य करना चाहिए।

४) शादी ब्याह तय करते समय पत्रिकाएँ ना देखी जाय।

५) दैववाद को पूरी तरह से हटाना बहुत जरूरी हैंl

सोलापूर में अखिल भारतीय फलज्योतिष समेंलन हुआ था।  युजीसी ने फलज्योतिष विषय भी इसमें जाय ऐसे सुझाया था तब अपनी जीत को जाहीर करने के लिए यह मेला संपन्न हुआ था।  अंनिस ने इस मेले का उपयोग इस शास्त्र की पोल खोलने के लिए किया।  कई ख्यातिप्राप्त फलज्योतिषी के द्वारा उनकी संस्थाओं के कुछ सबूत पेश करें ऐसी गुजारिश अंनिस के कार्यकर्ताओं ने की।  अपनी बात करने के लिए कोई भी फलज्योतिष इस प्रकार के संमेलनों में आगे नहीं आते ऐसा आज तक का अनुभव हैंl ऐसी बातें पर वादविवाद हो ही नहीं सकता ऐसी उनकी धारणा हैंl   फलज्योतिषीयों के अनुमान पूरी तरह से गलत साबित हो चुके थे और मुसीबत की इन घडीयों में हमने एक स्पर्धा आयोदित की थी अन्य देशों में इस प्रकार की बातों के विरोध में कोई भी कड़क कार्रवाई विदेशों हो जाती हैंl

विद्यार्थी गण ऐसे जनहितविरोधी कारनामों का विरोध करने की, फलज्योतिष और कुडंली इनपर विश्वास न रखने की शपथ लेने के लिए जगह जगह शपथ समारोह अंनिस द्वारा आयोजित किये गये।  इस कारण दैव, संजोग, नसीब जैसी बातों पर विश्वास न रखते हुए मेहनत का महत्व विद्यार्थीयों को समझें ऐसी उनकी अपोक्षा थी।  महाराष्ट्र के सुप्रसिध्द व्यक्तियों को अंनिस के द्वारा अनुरोध किया गया कि वे लोग आगे आकर इस झूठे शास्त्र के विरोध में अपनी भूमिका को प्रस्तुत करें।  अंनिस और प्रसिध्द व्यक्तियों के सहयोग से मानवीय मूल्यों के विरोध में खडे इस झूठे शास्त्र का निषेध के कार्यक्रम होने चाहिए।