अंध विश्वास

मानवी संस्कृति चाहे जितनी विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक वृत्ति की हो गई हो फिर भी चमत्कारों के ऊपर जो श्रध्दा है उसका उन्मूलन बोना मुश्किल है। मनुष्यमात्र को स्वाभाविक तौर पर चमत्कारों का बहूत आकर्षण होता है। ऐसी घटनाओं के हम गवाह हों ऐसा हमें दिल से लगता है। अपनी कहानी जितनी ज्यादा आश्चर्य कारक हो उतनाही अपना और उसका महत्व बढ़ जाता है। गर्व, संभ्रम, धर्मांधत, पक्षांधता के कारण कई अच्छे उद्देशों से शुरू हुए काम या उपक्रमों में चमत्कारों की घटनाओं की धार्मिक भोंदूगिरी और झूठी बातें घुस जाती है।
यदापि आजकल चमत्कारों पर भरोसा करनेवाले लोग बहुत मात्रा में पायें जाते हैं फिर भी आधुनिक इतिहासकार अपने ऐतिहासिक लेखन में चमत्कार भरी घटनाओं को शामिल नहीं करेंगे। समाचारपत्र और अन्य मीडीयावाले श्रध्दालु फाठकों के बारे मे ज्यादा लिखते है और चमत्कारपूर्ण समाचारों को प्रकाशित भी करते हैं। आजकल विवेकशील लोग चमत्कारभरे वृत्तों को पूरी तरह से असत्य मानते हैं। मगर हम जब चमत्कार होते ही नहीं सा निष्कर्ष निकालते हैं तब हमारा चमत्कारों पर विश्वास हताही नही। चमत्कारों पर विश्वास रखना विवेकपूर्ण आचरण नहीं होता, वह तो मात्र श्रध्दा होती है। श्रध्दा को विवेक का आधार नहीं लगता।
डायन प्रथा-
महाराष्ट्र में विदर्भ और मराठवाडा विभाग जायन के मार डालने को केंद्र कहा जाता है। इस डायन प्रथा कहते है। सन १९९९ के बाद विदर्भ में अलग अलग पुलिस थानों में २०० डायन को मार डालने का वृत्तांत पाया गया न आज भी यह प्रथा चालू है। विधवा और निराधार औरतों पर ही अक्सर डायन होने का आरोप किया जाता है। सी औरतें कम दर्जे के काम करके ज्यों त्यों जीवन जीते रहती हैं। उनकी थोडी जमीन और उनका मकान आदि जायदाद पर उनके रिश्तेदारों और पडौसियों की नज़र रहती है। वह जायदाद प्राप्त करने हतु इन महिलाओं को खत्म करना जरूरी होता है। उन्हें मार डालना या गाँव के बाहर निकल देना जैसे रास्ते से ही उन्हें जायदाद मिल सकती है।
जादूटोना करनेवाले तांत्रिक मांत्रिक-
प्रार्थना से यदि दूर का मरीज ठीक हो सकता है तो दूर रहनेवाले आदमी को तकलीफ देना भी संभव है । यज्ञयाग जैसे कुछ कर्मकांड करने सं उन्हे वशीकरण जैसी कुछ सिध्दियाँ प्राप्त होती है ऐसा उनका दावा है। इस क्षेत्र के पुरूषों को भगत कहते हैं और स्त्रियों को डायन कहते हैं। ये लोग मंत्रोद्वरा विषैले सांप भी मार सकते हैं। साथ ही साथ मंत्रो के जरिये अन्य लोगों के मन में आकर्षण, द्वेष या उथल-पुथल मचा सकते हैं ऐसा इनका दावा है।
स्त्रि मानसिक मरीज या जिन्हें अपने दुश्मन से बदला लेना है ऐसी कोई नारी अक्सर डायन बनती है ऐसी इनकी समझ है। लोग डायन के पास जागर इलाज कराते हैं। उनका दुश्मन भूत बाधासे पीड़ीत रहे या कुछ अदटित घट जायेगा इस भय से ग्रस्त रहे इसलिए वह उसे कुछ कर्मकांड करने के लिए कहती है। यह समाचार दूर दूर तक फैल जाता है और लोगों के मन में ऐसी डायने के प्रति बहुत डर समाया रहता है। अपने उपर वह कोई जादूटोना न करें इसलिए उसे पैसे या भेंटवस्तू देकर खूश ऱखने की कोशिश भी लोग करते हैं।
इस मामले में भगत लोग पक्के व्यावसायिक होते हैं। अपनी अलौकिक मंत्रशक्ति से वे किसी को भी त्रस्त कर सकते है ऐसा कहकर अपनी रोटीरोजी का प्रबंध कर लेते है। गाँव के वे सलाहकार, मार्गदर्शक, और वैद्य भी होते हैं। किसीको अपने समाज से निकालना हो तो भगत के साथ अन्य लोग मिलकर ऐसा काम करते हैं। ऐसे देहात पुलिसथाने से दूर होने के कारण पुलिस भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते। लोगों के भीतर डर समाया हुआ रहता है इसलिए वे ठीक ढंग से सोच नहीं पाते।
गलत प्रथाओं के उन्मूलन हेतु प्रयत्न –
ऐसी दुष्ट प्रथाएँ हटा देने के लिए अंनिस के कार्यकर्ता लोग कई साधनें को इकठ्ठा करने लगे है। स्थानिक स्तर पर सुशिक्षित युवाओं को इस काम के लिए अपने देहातों से अंनिस की शाखाएँ शुरू की जाती है और हर जगह कड़ी नजर रखकर कार्यकर्ताओं को काम करने के लिए प्रेरित किया जाता है। उसका अच्छा परिणाम भी दिखाई दे रहा हें। अंनिस ने शासन के अधिकारा, पुलिस अफसर, और गांववालों को अपनी समस्याएँ और उनका समाधान ढूंढने के लिए मंच पर इकठ्ठा बुलाया। अंनिस के लोग लोगों के स्वास्थ्य और शिक्षा का महत्व समझाने लगे सभी दुष्ट प्रथाओं का मूल कारण उन्हे बतलाकर जागृति पैदा करने लगे हैं।